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सोशल मीडिया पर तथ्यों से खिलवाड़

7 वर्ष पहले
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क्यामीडियासंस्थानों में काम कर रहे पत्रकारों को अब सोशल मीडिया का विशेष प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है। क्या सोशल मीडिया रिपोर्टिंग को लेकर अब मीडिया संस्थानों में बहस जरूरी नहीं है? विशेषकर हिंदी एवं क्षेत्रीय भाषी मीडिया संस्थानों में, जहां सोशल मीडिया रिपोर्टिंग का अर्थ सामान्यतया फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब विकीपीडिया के मंचों पर बहती सूचनाओं को मुख्यधारा के मीडिया में रख देना है। दरअसल, सोशल मीडिया रिपोर्टिंग के बाबत उचित ट्रेनिंग के अभाव से केवल अब कई मौकों पर तथ्यों से खिलवाड़ दिखने लगा है, बल्कि मुख्यधारा के मीडिया की अफवाह फैलाने में भूमिका की आशंका बढ़ गई है।

इस तरह के कई उदाहरण हैं, जब सोशल मीडिया से मिली सामग्री के जरिये लोगों का ध्यान खींचने के लिए पत्रकारिता के पहले सिद्धांत को ताक पर रखा। यानी पुष्ट किए बिना आनन-फानन में वीडियो या खबर को प्रसारित-प्रकाशित किया। रोहतक की बहनों का वीडियो सनसनीखेज बनाकर पेश किया गया, जिसे लेकर बाद में विवाद हो गया। सलमान खान की ‘किक’ फिल्म के ट्रेन के सामने से गुजरने वाले स्टंट की नकल के एक यूट्यूब वीडियो पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आधे-आधे घंटे के खास कार्यक्रम देखे गए। बाद में पता चला कि वो वीडियो फर्जी था। एक न्यूज चैनल के सोशल मीडिया से ही जुड़े एक कार्यक्रम में कार के पहिए के नीचे डॉलर आने के बाद एक शख्स द्वारा की गई अजीब-सी हरकत के एक वीडियो को इस तरह दिखाया गया कि वह असल वीडियो है, जबकि वह वीडियो संभवतया किसी फिल्म का क्लिप था। केरल की एक बच्ची के गाने का वीडियो वायरल हुआ तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में उसकी खोज को राष्ट्रीय मुद्‌दा बना दिया गया, जबकि फेसबुक पर उसके नाम समेत कई अहम जानकारियां मौजूद थीं, जिनके जरिये उस तक आसानी से पहुंचा जा सकता था।

देश में सोशल मीडिया उपयोक्ताओं की संख्या 12 करोड़ पार पहुंच चुकी है और यहां बात जंगल में आग की तरह फैलती है। ऐसे में इन मंचों का कौन-कैसे इस्तेमाल करेगा, यह समझ विकसित करना जरूरी है। फिर, किस बात को किस तरह पेश करने से उसका क्या मतलब निकल सकता है, ये भी सोशल मीडिया रिपोर्टिंग से जुड़ा सवाल है। मसलन किसी बात को व्यंग्यात्मक शैली में पेश करते हुए ट्विटर पर उसके आगे ‘स्माइली’ लगाए गए हैं, लेकिन कई बार अखबार-चैनल उन ‘स्माइली’ को हटाकर व्यंग्यात्मक बात को गंभीर बना देते हैं। ‘िव