जीत के साथ पेशेवर बॉक्सिंग का आगाज

5 वर्ष पहले
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बैन और उपेक्षा को झेलकर दोबारा बॉक्सिंग रिंग में उतरीं 2 सुपर मॉम

पिंकी जांगड़ा भी जीतीं

यहकहानी है उन दो इंटरनेशनल महिला बॉक्सरों की जिन्होंने घोर निराशा और पारिवारिक जिम्मेदारी के दौर से खुद को उभारकर एक नई शुरुआत की। 2014 के कॉमनवेल्थ खेलों की रजत पदक विजेता सरिता देवी पर एशियन गेम्स में मेडल वापस लौटाने पर एक वर्ष का बैन लगा था, जो अब पूरा हो चुका है। वहीं, हरियाणा की पहली अर्जुन अवॉर्डी बॉक्सर कविता चहल भी नौकरी में भेदभाव के सदमे और प्रेगनेंसी से उभरकर अब दोबारा रिंग में उतर चुकी हैं। ये दाेनों सुपर मॉम अपने छोटे बच्चों को परिवार के सहारे छोड़कर रोहतक की नेशनल बॉक्सिंग एकेडमी में कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों में जुटी हुई हैं। इस दौरान भास्कर प्रतिनिधि के साथ उन्होंने अपने संघर्ष और भविष्य की रणनीति साझा की।

^ जीवन का सबसे निराश करने वाला पल वह था जब अंतर्राष्ट्रीय उपलब्धियों के बावजूद वर्ष 2011 में डीएसपी की जगह कांस्टेबल पद पर मुझे ज्वाइनिंग करने को कहा गया। नौकरी में सरकार द्वारा बरती गई अनदेखी से काफी आहत हुई। तब मेरे पति परिवार ने नौकरी ठुकराने की सलाह दी, लेकिन मैंने ठंडे दिमाग से सोचा और खेल को जिंदगी मानते हुए ईमानदारी से मिली नौकरी को स्वीकारा। उस समय मुझसे कम मेडल जीतने वालों को भी डीएसपी बनाया गया था। वर्ष 2014 में एसआई पद पर पदोन्नति मिली। मेरा एक साल का बेटा विराज है। प्रेगनेंसी की वजह से करीब दो साल तक बाॅक्सिंग से दूर रहना पड़ा। बच्चे होने के बाद एक के बाद एक चैंपियनशिप खेलना और खुद को फिट रखना काफी मुुश्किल होता है। अब बेटे को परिवार के पास छोड़कर दोबारा तैयारी कर रही हूं। महज 20 दिन की प्रैक्टिस के बाद 19 से 24 नवंबर के बीच हरिद्वार में नेशनल में 81 किलो भार वर्ग में सिल्वर मेडल जीता तो हौसला बढ़ा है। अब कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों में लगी हूं।\\\'

^एशियन गेम्स में भेदभाव के चलते ब्राॅन्ज मेडल लौटाने पर मुझे एक साल के लिए बैन कर दिया गया था, जिसके बाद मैं अंदर से काफी टूट गई थी। तब मैंने खेल से संन्यास लेकर परिवार को समय देने का फैसला लिया, लेकिन इस दौरान मुझे मेरे पति थोई बासिंग, महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर पूरे देश से खेलने की हजारों अपील आई। तब लगा कि मैं अकेली नहीं हूं, मेरे साथ पूरा देश खड़ा है। अब मैं फिर से तैयारी में जुट गई हूं। मेरा लक्ष्य 2018 में कॉमनवेल्थ गेम्स में देश के लिए मेडल जीतना है। शादी बच्चे होने के बाद एक के बाद एक चैंपियनशिप खेलना और खुद को फिट रखना काफी मुुश्किल होता है। फरवरी, 2013 में बेटे तोमथिल का जन्म हुआ। 2014 में ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में छोटे बच्चे को घर छोड़कर प्रैक्टिस के लिए बाहर निकली। फिजियो ने दाहिने हाथ की कलाई में फ्रैक्चर की बात कहते हुए मुझे खेलने की सलाह दी, लेकिन हार नहीं मानी और सिल्वर मेडल जीता। मैंने अपने देश और छह माह के बेटे के लिए दर्द सहते हुए खेली। मैनेे बेहतर खेलने का प्रयास किया और अंत में बाॅक्सिंग स्पर्धा के फाइनल मैच में दर्द हद से बाहर हो गया तब मैं हार गई। गोल्ड जीतने का सपना पूरा नहीं हो सका, लेकिन मुझे इतना संतोष रहा कि मैंने सिल्वर मेडल जीतकर देश के लिए कुछ कर सकी।’



भास्कर ख़ास

इंफाल | पिंकीजांगड़ा ने अपने पहले पेशेवर मुकाबले में स्लोवाकिया की क्लाडिया फेरेंजी को 40-36, 40 36, 40-36 के सर्वसम्मत फैसले से हराया। अनुभवी सोम बहादुर पून ने लाइट हैवीवेट वर्ग में थाईलैंड के मनोप सिथियेम को हराया।



सुपर वेल्टर वर्ग राष्ट्रीय चैम्पियन खिताबी मुकाबले में चार बार के चैम्पियन सिद्धार्थ वर्मा ने तकनीकि नॉकआउट के जरिए जगन्नाथ को हराकर अपना खिताब बरकरार रखा। हालांकि एक अन्य अनुभवी भारतीय मुक्केबाज विपिन कुमार को हालांकि तीसरे दौर में ही युगांडा के मुबारक सेगुया ने नॉकआउट कर दिया।

इंफाल | अपनेपहले प्रोफेशनल मैच में एल.सरिता देवी ने हंगरी की सोफियो बेडो को 3-0 से हराकर कॅरिअर का आगाज जीत के साथ किया। मुकाबले में प्रवेश करते ही सरिता भारत की पहली महिला प्रोफेशनल मुक्केबाज भी बन गई।



पिंकी जांगड़ा,अनुभवी सोम बहादुर पून ने भी अपने-अपने मुकाबले जीते। 2014 के कॉमनवेल्थ खेलों की रजत पदक विजेता सरिता पूरे मुकाबले में 59 प्रोफेशनल मुकाबलों का विशाल अनुभव रखने वाली हंगरी की सोफिया पर पूरी तरह हावी रहीं। उन्होंने जोरदार पंच लगाते हुए सोफियो को एकतरफा अंदाज में 3-0 से शिकस्त दी। सोफिया के पेशेवर मुकाबलों का लंबा अनुभव था लेकिन पहला प्रो मुकाबला खेल रहीं सरिता उनसे बेहतर मुक्केबाज साबित हुई।

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