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बर्न यूनिट को नहीं मिली ऑक्सीजन 3 वर्ष तक डिब्बे में पड़े रहे 2 वेंटिलेटर

5 वर्ष पहले
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पीजीआईप्रबंधन की लचर व्यवस्था मरीजों पर भारी पड़ रही है। वेंटिलेटर की भारी कमी से जूझ रहे पीजीआई में तीन वर्ष तक दो वेंटिलेटर डिब्बा बंद पड़ रहे, लेकिन इनकी किसी ने सुध नहीं ली। मामला लाला श्यामलाल बिल्डिंग स्थित बर्न एंड प्लास्टिक सर्जरी विभाग का है। सुपर स्पेशलिटी ब्लॉक स्थित इस विभाग में ऑक्सीजन की पाइप लाइन नहीं होने से इन वेंटिलेटर को प्रयोग ही नहीं किया जा सका। जब इन वेंटिलेटर की उपयोगिता को लेकर सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत जानकारी मांगी गई तो बचाव के लिए तत्काल दोनों वेंटिलेटर को शिशु रोग विभाग को सौंप दिया। विभागीय डॉक्टरों की मानें तो यह स्थायी तौर पर नहीं किया गया है, लेकिन दबी जुबान से सच्चाई स्वीकारने में जरूर लगे हैं। अब बर्न प्लास्टिक सर्जरी जैसे गंभीर मरीजों वाला विभाग बिना वेंटिलेटर ही जीवन की डोर जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

पिछले दो वर्ष से ऑक्सीजन के नाम पर प्रबंधन के उच्च अधिकारी कहते चले रहे हैं कि अगर बिल्डिंग में गैस पाइप लाइन की व्यवस्था नहीं है तो सिलेंडर से काम चला लो। मरीज को ऑक्सीजन देने से मतलब होना चाहिए, जबकि उच्च अधिकारी भलीभांति परिचित हैं कि वेंटिलेटर के लिए ऑक्सीजन गैसपाइप लाइन की महत्ता कितनी है।

^ऑक्सीजन गैस पाइपलाइन की व्यवस्था नहीं होने के कारण वेंटिलेटरों को शिशु रोग विभाग में शिफ्ट करना पड़ा। हालांकि यह स्थायी तौर पर नहीं किया गया है। ऑक्सीजन की व्यवस्था होने के बाद वेंटिलेटर वापस मंगवा लिए जाएंगे।- डॉ.आरबी सिंह, विभागाध्यक्ष

दूसरों की जांच करना पड़ा महंगा

सूत्रोंके मुताबिक, बर्न एंड प्लास्टिक सर्जरी विभाग के मुखिया डॉ. आरबी सिंह पिछले काफी समय से पीजीआई में विजिलेंस जांच करने में जुटे हैं। बताया जाता है कि डॉ. सिंह कई मामलों की रिपोर्ट प्रबंधन को सौंप चुके हैं, जिनमें बड़े अधिकारी शामिल हैं। इस मामले को उससे भी जोड़कर देखा जा रहा है।

आरटीआई ने मचाया हड़कंप तो कर दी शिफ्टिंग

सीलबंद पड़े वेंटिलेटरों पर जब संस्थान के ही कुछ कर्मचारियों की नजर पड़ी तो आरटीआई के माध्यम से इसकी जानकारी मांगी गई। अधिकारी इसका जवाब देते उससे पहले ही विभाग से आनन-फानन में वेंटिलेटर शिशु रोग विभाग को सौंप दिए गए, जबकि गैस पाइपलाइन का प्रोजेक्ट अभी भी ठंडे बस्ते में है।

2012 में केंद्र से मिले थे 32 लाख, काम कुछ नहीं

जून2012 के दौरान केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से पीजीआई के बर्न एंड प्लास्टिक सर्जरी विभाग को 32 लाख रुपए बतौर दो वेंटिलेटर की खरीदी के लिए मंजूर हुए। इसी वर्ष के अंत तक विभाग में दोनों वेंटिलेटर मुहैया भी करा दिए गए, लेकिन इनके लिए आवश्यक ऑक्सीजन पाइप लाइन की व्यवस्था नहीं हुई। बहरहाल, एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे ऑफिस में पाइप लाइन की फाइलें घूमती रहीं और दोनों वेंटिलेटर सील बंद कोने में पड़े रहे।

आखिर जिम्मेदार कौन?

{वेंटिलेटर आने के बाद आखिर तीन वर्ष तक गैस पाइप लाइन क्यों नहीं दी गई?

{ गैस पाइप लाइन का प्रस्ताव ही नहीं था तो ये वेंटिलेटर दिए ही क्यों गए?

{ व्यवस्था नहीं बन रही थी तो इन वेंटिलेटर को अन्य विभागों को पहले ही क्यों नहीं दिया गया?

भारी कमी

1,32,000

हजारमरीज आते हैं हर वर्ष, लेकिन वेंटिलेटर 50 से भी कम

900

सेज्यादा मरीज रहते हैं इमरजेंसी में 100 से ज्यादा वेंटिलेटर की जरूरत

10

वेंटिलेटरखरीद की मिल चुकी है मंजूरी, अभी 40 और की है दरकार

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