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एक गांव जहां हर तीसरे ‌घर से एक महिला टीचर, नहीं है देवी- देवता का मंदिर / एक गांव जहां हर तीसरे ‌घर से एक महिला टीचर, नहीं है देवी- देवता का मंदिर

प्रदीप नारायण

Jun 24, 2016, 08:00 PM IST

हरियाणा के लुखी गांव की बेटियों ने सफलता की जो कहानी लिखी है वो देश के बाकी गांवों के लिए मिसाल बन सकती है।

इस गांव के हर घर से एक बेटी सरका इस गांव के हर घर से एक बेटी सरका
रेवाड़ी. हरियाणा के लुखी गांव की बेटियों ने सफलता की जो कहानी लिखी है वो देश के बाकी गांवों के लिए मिसाल बन सकती है। गांव की आबादी करीब चार हजार है। यहां हर तीसरे घर से एक बेटी सरकारी नौकरी करती है। ऐसी कुल 400 से ज्यादा बेटियां हैं। इनमें करीब 325 टीचर हैं। जानें गांव में क्यो नहीं है किसी देवी- देवता का मंदिर..
- गांव में सिर्फ शिक्षा की ही पूजा होती है, शायद इसलिए यहां किसी देवी-देवता का मंदिर तक नहीं है। लड़कों की तरह लड़कियों के जन्म पर भी यहां कुंआ पूजन होता है।
- गांव में जो व्यक्ति ज्यादा पढ़ा-लिखा होता है उसे पंडित जी की उपाधि दी जाती है। गांव के लोग सरनेम में जाति का प्रयोग भी नहीं करते हैं। शादी के समय परिवार का ही कोई सदस्य पंडित बनकर रस्मों को पूरा कराता है।

- आजादी के बाद तक इस गांव में बेटियों की पढ़ाई पर पाबंदी थी। यदि कोई अपनी बेटी को स्कूल भेजने का प्रयास करता तो पंचायत बुलाकर उससे माफी मंगवाई जाती थी।
- इसी दौरान बाहर से पढ़कर सोहनलाल यादव गांव आए। उन्होंने बेटियों की पढ़ाई के लिए खुद स्कूल खोला। विरोध हुआ तो उन्होंने अपने परिवार की बच्चियों को ही पढ़ाना शुरू किया। हालांकि चार साल तक कोई बदलाव नहीं आया। लेकिन सोहनलाल पंडितजी के नाम से जरूर प्रसिद्ध हो गए।
हरियाणा बनने के बाद पहली भर्ती में बनी दो महिला टीचर
1966 में हरियाणा राज्य बना। एजुकेशन डिपार्टमेंट में पहली भर्ती निकाली तो इस गांव के कई युवा टीचर बने। इसमें दो महिला शिक्षक भी थीं। तब से आज तक टीचर्स के लिए जितनी भी भर्तियां हुईं हैं, उनमें से एक भी ऐसी नहीं है जिसमें इस गांव की बेटियों का सिलेक्शन नहीं हुआ हो।
- शिक्षिका बनने के बाद जितनी बेटियां शादी के बाद गांव से ससुराल जाती हैं, उतनी ही बहुएं शिक्षिका के रूप में आ भी जाती हैं। 31 मई 1982 को पंडित जी चल बसे, लेकिन गांव की बेटियां उनके सपनों को आज भी सच कर दिखा रही हैं।

- गांव की रिटायर्ड डिस्ट्रीक्ट एजुकेशन ऑफिसर सुविधा यादव बताती हैं कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की इससे बड़ी मिसाल और क्या हो सकती है। हमारे गांव में शिक्षा ही मंदिर है। इसलिए लड़का-लड़की के रिश्तों में पहली प्राथमिकता टीचर को मिलती है। यहां की बहुओं में भी शिक्षिका बनने का उतना ही क्रेज है, जितना बेटियों में।
गांव वाले सरनेम भी नहीं लिखते हैं
पंडित सोहनलाल के वंशज 94 साल के आचार्य सुरेंद्र व 50 साल के सरपंच चंद्रहास बताते हैं कि यहां के गांव के लोग अपने नाम के पीछे जाति सूचक शब्द लगाने की बजाय कुमार व सिंह लगाते हैं। लड़के का रिश्ता होता है तो लगन के समय गांव के सबसे उम्रदराज और सबसे कम उम्र के बच्चे को शगुन के तौर पर 10-10 रुपए दिए जाते हैं।
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सभी फोटोज- चमन शर्मा
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