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जिद करों बदलों दुनिया: हाथ पड़े कमजोर तो हौसले से लिखी सफलता की कहानी

5 वर्ष पहले
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रोहतक। प्रीतम चंद नारंग शहर की वे शख्सियत हैं, जिन्होंने अपनी किस्मत हाथों से नहीं बुलंद हौसलों से लिखी है। डीएलएफ कॉलोनी में रहने वाले इंडियन बैंक के 59 वर्षीय विशेष सहायक का जीवन हर किसी के लिए मिसाल है। मां के गर्भ में ही नारंग के हाथ पूरी तरह विकसित नहीं हो पाए। इस बड़ी शारीरिक बाधा को मात देकर नारंग ने पैरों में कलम थामकर अपनी सफलता की कहानी लिखनी शुरू की।
धीरे-धीरे उन्होंने अपने अविकसित हाथों को ही हथियार बनाकर उनमें भी पेन थामा और अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। अब वे कंप्यूटर चलाने से लेकर कार ड्राइव तक खुद ही करते हैं। नारंग की काम के प्रति लग्न और जज्बे की वजह से राष्ट्रपति के हाथों उन्हें सम्मान मिला। नारंग जरूरतमंद बच्चों की मदद के लिए भी समाजसेवी संस्थाओं को अपना योगदान देते रहते हैं। उन्होंने कहा कि इसी वर्ष रिटायरमेंट के बाद अब सेवा में ही फुलटाइम लगना है।
जन्म के वक्त नारंग का कोहनी से ऊपर तक का आधा अधूरा हिस्सा ही बन पाया। इस कारण उनका बचपन मां शांति देवी पर निर्भर रहा। हाथ नहीं थे। इसका दुखद अहसास बचपन में ही हो गया। स्कूल गया तो लिखने की मुश्किल सामने आई। इसका हल पैरों में कलम थामकर निकाला। इस छोटी सी उम्र में ही उन्होंने जिद करनी शुरू की कि वे अपनी किस्मत खुद लिखेंगे। इसी तरह पैरों से लिखकर पढ़ाई कर दसवीं कक्षा पास की। स्कूलों में टाट (दरी) पर बैठकर पढ़ाई होती थी। इसलिए लिख पाता था।

पिछड़ों का बनेंगे सहारा : नारंग एनजीओ से जुड़कर जरूरतमंद बच्चों को शिक्षित बनाने की मुहिम में भी अपना योगदान दे रहे हैं। वे इसी साल नवंबर महीने में नौकरी से सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इसके बाद उनका विचार समाजसेवा करना है।
कॉलेज में बेंचों पर बैठे तो पैरों से लिखना हुआ मुश्किल
कॉलेज में कदम रखा तो लिखने की फिर समस्या आई। यहां बेंचों पर बैठकर पैरों से लिखना मुश्किल हुआ तो कोहनी तक विकसित हुए विकृत हाथों में ही पैन थामा। शुरू में पकड़ नहीं बनी। बार-बार पैन फिसलता था। दर्द भी होता था, लेकिन कुछ दिन में आदत हो गई, फिर दोनों विकृत हाथों से लिखना शुरू किया। वाणिज्य संकाय में स्नातक, अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर के अलावा सर्टिफाइड एसोसिएट इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकर्स (सीएआईआईबी) का कोर्स किया।
शंकर दयाल शर्मा ने किया सम्मानित
अपनी पढ़ाई व काबिलियत के दम पर 1976 में उन्हें बैंक में क्लर्क की नौकरी मिली। नौकरी करते हुए अपना काम पूरी लगन, मेहनत व ईमानदारी से किया। नतीजतन श्रेष्ठ कर्मचारी का सम्मान मिला। तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने 1993 में अपने हाथों से फिजिकल हैंडिकैप बेस्ट एंप्लाई का सम्मान दिया। नारंग ने बताया कि यह मेरे लिए गर्व की बात थी। पूरे परिवार का मान बढ़ा था।

अपनी पढ़ाई व काबिलियत के दम पर 1976 में उन्हें बैंक में क्लर्क की नौकरी मिली। नौकरी करते हुए अपना काम पूरी लगन, मेहनत व ईमानदारी से किया। नतीजतन श्रेष्ठ कर्मचारी का सम्मान मिला। तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने 1993 में अपने हाथों से फिजिकल हैंडिकैप बेस्ट एंप्लाई का सम्मान दिया। नारंग ने बताया कि यह मेरे लिए गर्व की बात थी। पूरे परिवार का मान बढ़ा था।
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