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3660 के बजाय 1200 एकड़ के अधिग्रहण पर सहमत थी कांग्रेस

7 वर्ष पहले
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रेवाड़ी। दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर को लेकर अधिगृहीत की जाने वाली बावल की 3660 एकड़ जमीन से जुड़ा एक और सच सामने आया है। दरअसल जिस जमीन को लेने के लिए कांग्रेस सरकार को किसानों के गुस्से को झेलना पड़ा, हिंसक झड़पें हुईं, उससे तत्कालीन सरकार अंदरखाते इतनी सहम गई थी कि उसने सारी जमीन लेने के बजाय केंद्र सरकार की तरफ से प्रस्तावित 1200 एकड़ जमीन ही अधिगृहीत करने का मन बना लिया था।
इसका खुलासा शुक्रवार को पूर्व सिंचाई मंत्री कप्तान अजय सिंह यादव और पूर्व मंत्री जसवंत सिंह ने भास्कर से विशेष बातचीत में किया। दोनों ने खुलासा किया कि इसी मकसद से हुड्डा सरकार ने सेक्शन 9 के नोटिस जारी करने के बाद अवार्ड प्रक्रिया को रोक लिया था।
कांग्रेस की मंशा से अनजान भाजपा सरकार ने सत्ता में आते ही पूरी जमीन को ही इस प्रोजेक्ट का अनिवार्य हिस्सा मानते हुए 4 दिसंबर को अवार्ड कर दिया। हालांकि इसी दौरान केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने सीएम खट्टर को सुझाव दिया था कि अगर जमीन लेना मजबूरी है तो 1200 एकड़ लेकर बाकी को छोड़ सकते हैं। इससे किसानों के विरोध से बच जाएंगे लेकिन इसे भी स्वीकार नहीं किया गया।
"लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ा था नुकसान'
शुक्रवार को कप्तान यादव व जसवंत सिंह ने विशेष बातचीत में खुलासा किया कि जमीन अधिग्रहण के मसले पर जिस तरह किसानों का विरोध बढ़ा और 16-22 जुलाई 2012 को खूनी घटनाएं हुईं, उससे हुड्डा सरकार ने मसौदे पर नए सिरे से सोचना शुरू कर दिया था। लोकसभा चुनाव में इसका नुकसान भी भुगतना पड़ा था। ऐसे में हुड्डा ने एचएसआईडीसी के अधिकारियों से विचार किया और लगभग यह तय हो गया था कि बावल में फिलहाल इस प्रोजेक्ट लिए 1200 एकड़ जमीन की जरूरत है। केंद्र सरकार ने इतनी जमीन के लिए मुआवजा भेजा है।
कांग्रेसियों ने इतने समय तक क्यों छिपाया सच
कप्तान का तर्क है पूर्व सीएम हुड्डा ने उन्हें किसानों के साथ गठित की गई कमेटी में जानबूझकर शामिल नहीं किया था। ऐसे में उनकी जवाबदेही नहीं बनती थी। उस समय हालात भी ऐसे नहीं थे कि वे अपनी बात कह सके। ऐसा भी नहीं है कि अब सब कुछ बिगड़ चुका है। अगर भाजपा सरकार की नीयत है तो वह 1200 एकड़ जमीन को ही अधिगृहीत कर किसानों को उनकी मांग के अनुसार मुआवजा देकर विवाद को निपटा सकती है लेकिन ऐसा लगता नहीं है कि सरकार को किसानों की चिंता है।
सच छिपाना भी साजिश, होनी चाहिए जांच : कामरेड
जमीन अधिग्रहण के विरोध में किसानों की पैरवी कर रहे कामरेड राजेंद्र सिंह ने कहा कि इस छिपे सच के खुलासे ने कांग्रेस और भाजपा नेताओं की असलियत को सामने ला दिया है। किसानों का आंदोलन कामयाब हो जाता अगर किसान संघर्ष समिति के कुछ सदस्य नेताओं से मिले नहीं होते। सत्ता हासिल करने के लिए किसानों के ओछी राजनीति करने वालों को समय आने पर जवाब दिया जाएगा।
नांगल चौधरी-अटेली विधायकों ने की जमीन देने की पेशकश
नांगल चौधरी के विधायक अभय सिंह और अटेली की विधायक संतोष यादव की तरफ से सीएम को कॉरिडोर परियोजना के लिए अपने इलाके से जमीन देने के प्रस्ताव से विवाद में नया मोड़ आ गया है। इन दोनों विधायकों का तर्क है कि उनका इलाका औद्योगिक क्षेत्र में पूरी तरह से पिछड़ा हुआ है। यहां की पंचायतें जमीन देने के लिए तैयार हैं। अगर यह परियोजना उनके क्षेत्र से जुड़ती है तो विकास के लिहाज से सभी के लिए बेहतर होगा और इस विवाद का भी निपटारा हो जाएगा। हालांकि अभी इस पर सरकार की तरफ से कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है।