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रेजीमेंट आॅफ आर्टिलरी कमीशन के तमगे से नवाजे गए रोहतक के सत्येंद्र

7 वर्ष पहले
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रोहतक. "क्यों कदम पीछे हटेंगे, फौज ने इस काबिल बनाया सरहदों पर हम डटेंगे' यह उद्गार दो दिन पहले रेजीमेंट आॅफ आर्टिलरी कमीशन के तमगे से नवाजे गए सत्येंद्र वशिष्ठ के हैं। आईएमए देहरादून में पासिंग आउट सेरेमनी से रविवार की सुबह लौटे वशिष्ठ दैनिक भास्कर से बातचीत कर रहे थे।

ट्रेनिंग से मिला वतनपरस्ती का जज्बा
भालौठ गांव निवासी सत्येंद्र ने 12वीं की पढ़ाई पूरी कर टेक्नीकल एंट्री स्कीम (टीईएस) के जरिए वर्ष 2011 में इंडियन मिलिट्री एकेडमी देहरादून (आईएमए) से फौजी जीवन की शुरुआत की। यहां तीन वर्षों में सोचने का न केवल ढंग बदला, बल्कि देश-काल और परिस्थितियों की बारीक समझ भी विकसित हुई। ट्रेनिंग के दौरान वतनपरस्ती का जज्बा भरा गया। बुलंद हौसलों से जीने और जीतने के गुर सिखाए गए।

रंगरूट हूं, जिम्मेदारी का है एहसास
अब देश की निगहबानी की जिम्मेदारी व जवाबदारी हमारे जैसे रंगरूटों के कंधों पर है। फक्र इस बात का है कि देश ने भरोसा जताया और रक्षा पंक्ति में खड़े होने का सौभाग्य दिया। सत्येंद्र ने कहा कि इसी अहसास को आपसे बांट रहा हूं। जनवरी 2015 से एक वर्ष की ट्रेनिंग के लिए मध्य प्रदेश के सेना के महू सेंटर पर जाना है। जहां से पोस्ट कमीशन की ट्रेनिंग पूरी होने के बाद झांसी की यूनिट में तैनाती होगी।

मां राजबाला ने बताया कि सत्येंद्र के पिता रिटायर्ड सूबेदार शिव नारायण के साथ वे 13 दिसंबर को पासिंग आउट सेरेमनी में शामिल हुई। वहां देश सेवा में बेटे को लगाने के लिए हमें गौरव पदक से सम्मानित किया गया। इस दौरान सम्मान में बजी तालियों की गूंज ताउम्र सुनाई देगी। पिता ने कहा कि बेटे ने सेना में अधिकारी बनकर हमारा भी सपना पूरा किया है।
फोटो- रेजिमेन्ट आॅफ आर्टिलरी कमीशन बने सत्येन्द्र वशिष्ट परिवार के साथ।