रोहतक। रंगमंच का जीवन से सीधा सरोकार है। टेक-री-टेक की परिपाटी नहीं है। यहां सब कुछ जिंदा, ताजा और अनुभूति से जुड़ा होता है। जिन संघर्षों, समझौतों के बीच आम अादमी जूझ रहा है, आज वही नाटक की भावभूमि है, जिसे सच्चाई के साथ स्टेज पर जनता को ही लौटाना होता है। इसी कसमकश में रंगकर्मी का शुरू हुआ सफर आखिरी सांस तक अनवरत चलता रहता है। यह कहना है हिसार रंगमंडल के संस्थापक एवं चर्चित नाटक ख्वाहिशें के डायरेक्टर अनूप मीचू का। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में मीचू ने दिल के उद्गार कुछ यूं व्यक्त किए।
समाज से रंगकर्मी का सरोकार कैसा है?
जवाब: रंगकर्मी का समाज से सीधा सरोकार है। रंगमंच बुनियादी चीजों पर फोकस करता है। आसपास की घटनाएं, जिन्हें हम रोज जीते हैं, बिना बदलाव के उसी से हमें रूबरू करा देना ही रंगकर्मी का धर्म होता है।
आज नाटक देखने और दिखाने की मर्यादाएं टूट रही है। ऐसे में हम कहां खड़े हैं?
जवाब : बिल्कुल ठीक कहा। ग्लैमर की चकाचौंध से गिरावट हर-स्तर पर है। सबको शार्टकट और कुछ चटपटा लुभाने वाला चाहिए, लेकिन बता दें। यह रंगमंच की कसौटी नहीं। जो घटेगा वही नाटक की कहानी होगी।
इंटरनेट, गूगल, वाट्स एेप पर थिरकने वाली पीढ़ी के लिए कहानी-संवाद के क्या मायने हैं?
जवाब : हाल के वर्षों में भारतीय सभ्यता संस्कृति काे बहुत नुकसान पहुंचा है। कारण संस्कार की जड़ों से हमारा कटना है। जब संवेदनाएं दम ताेड़ रही हों, तो सचमुच कहानी और संवाद के क्या मायने रहेंगे।
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