रोहतक. भारतीय पहलवान योगेश्वर दत्त ने रविवार को एशियन गेम्स में इतिहास रचते हुए भारत को कुश्ती में गोल्ड मेडल दिलाया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह गोल्ड मेडलिस्ट पहलवान बाहर से जितने कड़क है उतने ही अंदर से नर्म दिल इंसान। योगेश्वर पहलवानी के साथ-साथ अपनी दोस्ती के लिए भी जाने जाते है। इनके दोस्तों की लिस्ट वैसे तो बहुत लंबी है, लेकिन भारतीय पहलवान
सुशील कुमार से इनका काफी गहरा नाता है। 10 साल की उम्र में दोनों अखाड़े में मिले थे। तब से साथ खेलते, साथ खाते-पीते कब 17 साल निकल गया पता ही नहीं चला। दोस्ती ऐसी कि दंगल के दौरान साथ लंगोट तक बदली। कोई इन्हें जय-वीरू कहता तो कोई इनकी दोस्ती की मिसाल देता नजर आता। दिन में 8 घंटे तक साथ वक्त बिताते हैं। बहरहाल, मैदान पर भारत के लिए खेलने वाले ये दोनों पहलवान असल जिंदगी में एक-दूसरे के सबसे जिगरी दोस्त हैं और सबसे बड़े आलोचक भी।
एक ही सिक्के के दो पहलु
लंदन ओलिंपिक में पदक हासिल करने के बाद एक इंटरव्यू के दौरान दोनों से पूछा गया कि आपकी दोस्ती को कितने साल हो गए तो जवाब मिला- सुशील कुमार (दिमाग पर जोर डालते हुए से) 1995?, योगेश्वर दत्त नहीं...नहीं, 1997। "इस साल हमारी दोस्ती को 17 साल हो जाएंगे। इतने समय से हम साथ हैं। सुशील सच यार, मुझे बिलकुल याद नहीं। हम छोटे-छोटे बच्चे थे। हम भाई तो नहीं, मगर किसी भी मायने में सगे भाइयों से कम भी नहीं हैं। एक-दूसरे की कामयाबियों और नाकामियों को हमने एक साथ देखा और उनसे पार पाया है। हम जय और वीरू से भी ज्यादा गहरे दोस्त हैं।"
कुश्ती, खाना सब साथ-साथ
गांव भैंसवाल से योगेश्वर दत्त दस साल की उम्र में छत्रसाल स्टेडियम पहुंचा था। जहां महाबली सतपाल सुशील को ट्रेनिंग कराते थे। वहीं से दोनों की दोस्ती शुरू हुई। अभ्यास के दौरान कई अवसरों पर योगी व सुशील की कुश्ती हुई। दोनों एक साथ खाना खाते और बाद में रूम भी एक ही शेयर करते। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबले से दोनों के बीच खूब बात होती, जिसमें विपक्षी पहलवान के वार पर तोड़ निकालने के लिए दोनों अपने टिप्स साझा करते।
दोस्ती के लिए कुछ भी
शरीर से बेहद कड़क दिखने वाले योगेश्वर दिल से बहुत विनम्र हैं। वे दोस्ती के लिए कुछ भी कर सकते हैं। अपने सबसे करीबी दोस्त सुशील और बजरंग के लिए वो हमेशा तैयार रहते हैं। पहलवानी का अखाड़ा हो या फिर फुर्सत के पल वो हमेशा अपने दोस्तों के करीब रहते हैं। अपने नाम और कामयाबी के पीछे भी वो अपने दोस्त और परिवार वालों को ही सबसे खास मानते हैं।
बचपन से शरीर पर लगती थी चोटें
योगेश्वर का बचपन से सपना था कि वो ऐसा कुछ करें जो भारत देश के काम आए, लेकिन कुश्ती के दौरान शरीर की चोटों के आगे हिम्मत टूट चुकी थी। योगेश्वर के मुताबिक बचपन से ही उन्हें बहुत चोट लगती थी। फिर भी मन ने हार नहीं मानी वो आगे बढ़ते गए। लंदन ओलिंपिक से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों तक योगेश्वर अपने बल और साहस से ही कामयाबी की सीढ़ी चढ़ते गए।
आठ साल की उम्र से शुरू की कुश्ती
2 नवंबर 1982 को हरियाणा के
सोनीपत जिले में जन्मे योगेश्वर दत्त कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले ओलिंपिक में भी स्वर्ण पदक जीतने से चूक गए थे। योगेश्वर ने आठ साल की उम्र से ही कुश्ती में हाथ आजमाना शुरू कर दिया था। उन्होंने बलराज पहलवान से प्रेरणा ली, जो कि हरियाणा में उन्हीं के गांव से संबंध रखते हैं। योगेश्वर ने अपने कोच रामफाल से कुश्ती की ट्रेनिंग ली और दांव-पेच सीखे।
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