रोहतक. बर्तानिया की ईस्ट इंडिया कंपनी के मुल्क में आते ही बंदिशें, प्रताड़ना, जकड़न पसर गई, यह कहते हुए एक सांघी मंच पर आता है। थोड़ी देर में 15 और कलाकार ‘छाती चौड़ी, सर पै पगड़ी..’ गाते हुए मंच पर आते हैं। इसके बाद सांघी ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लगान की दास्तां को बयां करता है। माहौल गमगीन हो जाता है। यह दृश्य है चंडीगढ़ के निर्देशक जीएस चन्नी द्वारा रचित नाटक 1857 की कहानी हरियाणा की जुबानी, लेकिन नाटक में न तो कलाकार हरियाणा के हैं और न ही उनकी बोली ठेठ हरियाणा की। यहां तक कि पगड़ी बांधने की तरीका भी हरियाणवी नजर नहीं आया। ठेठ हरियाणा की संस्कृति से परिचित लोगों ने हरियाणा पर्यटन विभाग की ओर तैयार किए गए नाटक को पहली ही नजर में नकार दिया।
कलाकारों से बेरुखी, बना दिए सेंटर
हरियाणा की लोक संस्कृति का विदेशों में भी डंका बजने के बावजूद प्रदेश में कलाकारों की मंच पर प्रस्तुति न होना हैरानी जता गया। बता दें कि एमडीयू से ही लोक नृत्य ने दो साल पूर्व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश में प्रथम स्थान हासिल किया था। वहीं कुरुक्षेत्र में कला को निखारने के लिए बनाया गया मल्टी आर्ट कल्चरल सेंटर भी इस दिशा में कोई विशेष कदम नहीं उठा पा रहा है।
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