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दाेस्त ने किया सावधान, नहीं तो सोते हुए हम डूब जाते, मदद के इंतजार में गुजरे दिन

7 वर्ष पहले
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रोहतक। हैलो, मैं सलीम बोल रहा हूं। रात के 3 बजे हैं। झेलम का फ्लड चैनल अभी-अभी टूट गया। बाढ़ का सैलाब श्रीनगर को डुबाेने आ रहा है। प्यारे दोस्त अंकुर! बहुत कम समय है। अपने परिवार को बचा सकते हो तो बचा लो। बेखौफ सो रहे अंकुर के कान में जैसे ही ये शब्द पड़े तो एकबारगी उनके होश उड़ गए। समझ में नहीं आया कि क्या किया जाए। प्रथम तल के फ्लैट से बाहर निकलते ही खुद को एक फुट पानी के बीच खड़ा पाया।
श्रीनगर में मोबाइल नेटवर्क की एक कंपनी में मैनेजर पद पर कार्यरत अंकुर अरोड़ा बेटी व पत्नी दो रिश्तेदारों के साथ भीषण बाढ़ में फंसे हुए थे। रविवार की सुबह 9:30 बजे जवाहर नगर स्थित अपने घर पहुंचे तो खुशी का माहौल था। भास्कर से बातचीत में उन्होंने जिंदगी के लिए संघर्ष मेें कटे 10 दिनों की दास्तां बयां की। बकौल अंकुर भगवान का शुक्र था कि दोस्त का फोन आ गया वर्ना हम जिंदगी की बाजी हार गए थे। अलर्ट होते ही पत्नी व बेटी को लेकर हम सीधे तीसरे फ्लाेर की छत पर चढ़ गए। कुछ ही मिनट बीता था कि बाढ़ का पानी मकान की पहली मंजिल को डुबोता हुआ दूसरे तल पर आ गया था।
बचाओ, पानी आ गया

सुबह चारों ओर पानी था। हमारे साथ मुख्यमंत्री की पार्टी के वाइस प्रेसीडेंट और मंत्री नासिर अबदुल्ला का भी परिवार परेशान था। शाम को बोट दिखाई दीं तो उसमे बच्चों व बुजुर्गों को ही ले जाया जा रहा था। चौथी बोट देख 3 साल की बेटी वानी ने आवाज लगाई, तो वोट हमारी तरफ मुड़ गई।
लगा यहां न डूब जाएं

झेलम नदी के पुल से एक फीट नीचे गुजर रहा सैलाब देख वहां शरण लिए 500 लाेगों की सांसें अटक जातीं। दूसरी बोट से पहले पत्नी व बेटी का सुरक्षित स्थान पर भेजा। बाद में हम भी वहां पहुंचे। एक स्थानीय परिवार ने घर में पनाह दी। वहां 4 दिन काटने पड़े। पानी और दूध के लिए 6 किमी भटकना पड़ता था।
अनजान से घर पहुंचने की जगी उम्मीद

शुक्रवार को हम राजभवन 6 किमी पैदल चलकर पहुंचे। तभी पीछे से आ रही कार रुकी। चालक ने बैठने को कहा। वह भी घर वालों की तलाश में था। उसने हमें वापस राजभवन छोड़ा। जहां से हम रात 8 बजे चंडीगढ़ के लिए रवाना हुए।रोहतक. रोहतक पहंुचने पर खुशी मनाता अरोड़ा परिवार।