चंडीगढ़ में हिमाचल के कवियों का एक दिन
पंजाबी लेखकोंकी संस्था साहित्य चिंतन के न्योते पर हिमाचल के छह कवियों ने पिछले रविवार को अपना एक दिन चंडीगढ़ में बिताया। चंडीगढ़ के प्राचीन कला केन्द्र के हॉल में कवियों को सुनने के लिए पंजाबी साहित्य के कई जाने-माने लेखकों के अलावा बड़ी संख्या में श्रोता भी जुटे।
इस कार्यक्रम का संचालन साहित्य चिंतन संस्था के प्रमुख सरदारा सिंह चीमा ने किया और कवि गोष्ठी की अध्यक्षता जाने-माने साहित्यकार विपाशा के संपादक रहे डाॅ. तुलसी रमण ने की। अपने शुरुआती संबोधन में सरदारा सिंह चीमा ने अपनी संस्था के पिछले साल भर के कार्यों का ब्योरा रखा। इससे पूर्व पिछले साल इस दुनिया से रुख्सत हुई कई लेखकों को श्रद्धांजलि देते हुए सभी लेखकों ने दो मिनट का मौन रखा।
चीमा ने इसके बाद हिमाचल से इस कार्यक्रम में आमंत्रित कवियों तुलसी रमण, हुकुम ठाकुर, यादवेंद्र शर्मा, प्रकाश बादल, विक्रम मुसाफिर, ब्रह्मानंद देवरानी और मोहन साहिल का स्वागत करते हुए कहा कि पंजाबी के लेखकों और हिमाचल के हिंदी कवियों को लाने का उद्देश्य हिमाचल में लिखी जा रही कविता से उन्हें रूबरू करवाना है। उन्होंने इस प्रकार के कार्यक्रमों के आयोजन पर जोर देते हुए कहा कि इससे पंजाबी और हिमाचली साहित्यकारों में बीच एक रिश्ता बनेगा जो दोनों क्षेत्रों के साहित्य के लिए अच्छा रहेगा। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ लेखिका रेखा किसी व्यक्तिगत कारण से शामिल नहीं हो पाईं। इस कार्यक्रम में प्रदेश के वरिष्ठ साहित्यकर्मी राजकुमार राकेश, आधार प्रकाशन के संचालक देश निर्मोही, साहित्यालोचक निरंजन देव आदि भी श्रोताओं के रूप में उपस्थित थे।
इस मौके पर वरिष्ठ साहित्यकार और कवि डाॅ. सत्यपाल सहगल ने भी हिमाचल से आए कवियों का स्वागत किया और कहा कि हिमाचल पंजाब के लेखकों का आपसी संवाद और मिलन होना चाहिए। इससे दोनों जगहों के लेखकों की रचनाशीलता के बारे में एक दूसरे को पता चलेगा। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की गोष्ठियां हिमाचल में भी आयोजित होनी चाहिए जिसमें पंजाबी के लेखक शामिल हों। इससे पंजाबी के लेखकों को पहाड़ के जीवन और वहां की कठिनाइयों को जानने का मौका मिलेगा। उन्होंने हिमाचल में लिखी जा रही कविता की प्रशंसा की और कहा कि कवियों को आत्म मुग्धता से बचना चाहिए और एक अच्छी कविता रचने के बारे में ही सोचना चाहिए। सहगल के संबोधन के बाद आयोजित कवि गोष्ठी में सबसे पहले विक्रम मुसाफिर ने अपनी कविताएं सुनाईं। उन्होंने अपने नए कविता संग्रह लौट आया सैलाब से कई कविताएं सुनाईं जिसको खूब सराहा गया। दूसरे कवि के रूप में ब्रह्मानंद देवरानी ने अपनी कविताओं से समा बांधा। उन्होंने कई छोटी लेकिन प्रभावपूर्ण कविताएं प्रस्तुत कीं। अपनी गज़लों लिए प्रसिद्ध प्रकाश बादल ने वर्तमान सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था पर चोट करती हुई कई गजलें एक के बाद एक प्रस्तुत कीं जिन्हें उपस्थित श्रोताओं ने बार-बार तालियां बजाकर सराहा। कुल्लू से आए हुकुम ठाकुर ने पहाड़ों की संवेदना में बुनी अपनी कई कविताएं सुनाईं जिनमें स्थानीय बोली के शब्दों की महक थी। यादवेंद्र शर्मा ने अपनी खास शैली की कविताओं से खूब प्रभाव डाला। मोहन साहिल ने भी कई प्रभावपूर्ण कविताएं सुनाईं।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में डाॅ. तुलसी रमण ने पंजाब और हिमाचल के रिश्ते के इतिहास पर रोशनी डालते हुए कहा दोनों राज्यों के लोगों का रिश्ता सदियों से रहा है। वर्तमान हिमाचल के अधिकतर हिस्से आजादी के कई साल बाद तक पंजाब में रहे। पंजाब की संस्कृति से हिमाचल का बड़ा हिस्सा प्रभावित रहा है। उन्होंने हिमाचल की बोलियों से हिंदी कविता में रहे कई शब्दों पर कहा कि इससे हिंदी भाषा समृद्ध हो रही है उसका विस्तार हो रहा है। उन्होंने कहा कि हिमाचल में हर 50 किलोमीटर के बाद बोली बदल जाती है। ऐसे में यहां के लोगों ने हिंदी भाषा को स्वीकार किया और हिमाचल में साहित्य भी हिंदी में ही रचा जा रहा है लेकिन उसमें कवि अपनी बोली के शब्दों का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं जो अच्छी बात है।
डाॅ. रमण ने साहित्य चिंतन संस्था को इस आयोजन के लिए बधाई देते हुए कहा कि इस प्रकार का यह पहला प्रयास हुआ है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पंजाबी के प्रमुख कवि पाश, सुरजीत पातर, अमरजीत कौंके आदि को हिमाचल में भी उतना ही पसंद किया जाता है जितना पंजाब में। अच्छी रचना भाषा की दीवारें तोड़कर दूर-दूर तक पहुंचती हैं। उन्होंने डाॅ. सत्यपाल सहगल को इस आयोजन मे सहयोग के लिए बधाई दी और कहा कि सहगल का हिमाचल में होने वाले साहित्य आयोजनों में बराबर शामिल होना बताता है कि वे हिमाचल और यहां की कविता से उनका बेहद जुड़ाव है। आयोजन के बाद सभी अतिथि कवियों ने साहित्य चिंतन संस्था और डाॅ. सहगल के आतिथ्य और सत्कार के लिए उनका आभार जताया।
-सृजनभास्कर