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बिना विचारे कोई कार्य करें: कमलकांत

5 वर्ष पहले
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नौणीमें चल रही भागवत कथा के सातवें दिन आचार्य कमलकांत ने कहा कि पूरे 100 साल बाद भगवान श्रीकृष्ण बलराम का बड़ा ही मार्मिक मिलन कुरुक्षेत्र में उन गोप-ग्वालों मां यशोदा से हुआ था। उन्होंने अर्जुन से सुभद्रा का विवाह एवं भस्मासुर की कथा का वर्णन किया। यदवंश को ऋषियों के शाप की कथा का वर्णन करते हुए कहा कि बिना विचार किए कोई कार्य नहीं करना चाहिए अन्यथा पछताने पर भी लाभ नहीं होता। उसी श्राप के प्रभाव से यदुवंश का नाम हुआ था।

उन्होंने कहा कि चलते-फिरते, उठते-बैठते हर स्थिति में उस प्रभु को याद रखना चाहिए, क्योंकि जीवन का सत्य मृत्यु है। आत्म कल्याण की चिंता करते हुए मनुष्य शुभ कर्म करें। उन्होंने सत्संग की महिमा का भी वर्णन किया।

आचार्य कमलकांत ने भगवान श्रीकृष्ण का उद्धव को अंतिम उपदेश के बारे में बताते हुए कहा कि बुद्धजीवियों की बुद्धिमानी विवेकियों का विवेक इसी में है कि वह अपने मन को मुझ अविनाशी (भगवान) में लगाएं। इसके बाद बलराम का स्वधाम गमन होता है। कथा के समापन अवसर पर विशेष पूजा भजन कीर्तन के साथ भंडारे का भी आयाेजन किया गया।

नौणी में भागवत के सातवें दिन आचार्य ने दिए प्रवचन

नौणी में आयोजित भागवत कथा को सुनते लोग।

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