शिमला. शहर में पीलिया सीवर युक्त पानी से ही फैला है। अश्वनी खड्ड में हेपेटाइटिस ई वायरस पाया गया है। यह वायरस मल्याणा सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट से अश्वनी खड्ड में पहुंचा। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) पुणे से आई जांच रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ। एनआईवी ने मल्याणा सीवरेज प्लांट के अाउटलेट, अश्वनी खड्ड, सोलन और छोटा शिमला के एक घर से जांच के लिए पानी के नमूने लिए थे। जांच में सभी जगहों से लिए सैंपल पॉजीटिव निकले हैं।
ई वायरस की मात्रा अधिक
मल्याणा सीवर प्लांट से ट्रीटमेंट के बाद छोड़े जा रहे पानी, अश्वनी खड्ड में हेपेटाइटिस ई वायरस अधिक मात्रा में पाया गया है। वीरवार को नगर निगम के डिप्टी मेयर टिकेंद्र पंवर ने पत्रकार वार्ता में एनआईवी और अन्य माइक्रो लैब से आई रिपोर्ट के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि पीलिया मामले में किसी एक को दोषी ठहराने के बजाय इस समय जरूरत है मिलकर काम करने की। नगर निगम ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और आईपीएच महकमों को इस दिशा में सार्थक प्रयास करने होंगे। साझे प्रयास से ही इस गंभीर मामले को हल किया जा सकता है।
डिप्टी मेयर ने क्या कहा
डिप्टी मेयर ने कहा कि निगम ने शहर में सभी सेक्टर स्टोरेज टैंक साफ करवा दिए हैं। वहीं निगम के नोडल अफसरों ने घर-घर पहुंच कर पंद्रह हजार से अधिक टंकियां साफ करवाई हैं। उन्होंने कहा कि स्कूलों में छुट्टियां होने के कारण कई लोग घर गए थे, जो अब स्कूल खुलने पर वापस आ गए हैं। हालांकि, अब अश्वनी खड्ड से पानी नहीं लिया जा रहा है, पहले सप्लाई के साथ वायरस टंकियों तक पहुंचा है। इसलिए लोग अपनी टंकियां साइंटिफिक तरीके से साफ करवाएं, ताकि वायरस खत्म हो जाए। जब तक टंकियों की सफाई नहीं की जाएंगी, तब तक वायरस खत्म नहीं होगा और पीलिया होने की संभावना बरकरार ही रहेगी।
बरांडी, कोटी से पानी लाने में देर क्यों
डिप्टी मेयर ने कहा कि आईपीएच विभाग ने अश्वनी खड्ड से आपूर्ति बंद करने के बाद शहर के लिए कोटी और बरांडी से पानी लाने की योजना बनाई है। पेयजल योजना को लेकर डीपीआर भी बना दी गई है, मगर इस पर तेजी से काम नहीं हो रहा है। जबकि शहर में जल संकट को देखते हुए इस योजना पर युद्धस्तर से काम होना चाहिए था। उन्होंने सरकार से मांग की है कि योजना का काम जल्द से जल्द शुरू करवाया जाए, ताकि इसे अश्वनी खड्ड के विकल्प के तौर पर अपनाया जा सके।
शहर में पेयजल संकट
शहर में अश्वनी खड्ड से 2 जनवरी से निगम पानी नहीं ले रहा है। अश्वनी खड्ड से जुड़े पंथाघाटी, विकासनगर, न्यू शिमला, छोटा शिमला आदि क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति गिरि, गुम्मा से हो रही है, मगर इनमें इन दिनों पानी कम होने से पूरे शहर में आपूर्ति प्रभावित हो रही है और लोगों को दूसरे तीसरे दिन पानी नसीब हो रहा है।
रिपोर्ट में क्या-क्या
हेपेटाइटिस ई वायरस सीवर से फैलता है और यह सब मल्याणा सीवर ट्रीटमेंट प्लांट से अश्वनी खड्ड में पहुंचा है। जांच में सामने ये भी आया है कि अन्य वायरस को क्लोरीनेशन करके खत्म किया जा सकता है, लेकिन हेपेटाइटिस ई वायरस ऐसा है कि इस पर क्लोरीनेशन का कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता है। यही वजह है कि यह वायरस घरों तक आसानी से पहुंच गया। वैसे तो पहले से ही यह तय था कि पीलिया दूषित पानी के सेवन से हुआ था, लेकिन अब जांच एजेंसियों की रिपोर्ट ने पीलिया की असली जड़ सामने लाई है।
2007 में भी था हेपेटाइटिस ई वायरस
शहर में वर्ष 2007 में जब पीलिया फैला था, उस समय में इसका कारण हेपेटाइटिस ई वायरस सामने आया था। यह हेपेटाइटिस ई वायरस मल्याणा सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट से छोड़े गए सीवरयुक्त पानी के साथ अश्वनी खड्ड के पानी में मिला था। अश्वनी खड्ड में जिस जगह से विकासनगर, पंथाघाटी, न्यू शिमला, छोटा शिमला आदि जगहों के लिए पानी लिफ्ट किया जाता है, सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट का पानी उससे पहले खड्ड में मिलता है। यही वजह है कि यह वायरस पेयजल योजना के पानी में मिल गया।
आउटलेट बदलने का दिया सुझाव
2007 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी पुणे ने जांच में हेपेटाइटिस ई वायरस आने पर सीवरेज प्लांट के आउटलेट को बदलने का सुझाव दिया था, ताकि प्लांट से जो पानी आता है, वह पेयजल योजना में न मिले, लेकिन सरकार ने इस सुझाव पर ध्यान नहीं दिया। आउटलेट न बदलने के कारण आज शिमला शहर फिर से पीलिया की चपेट में आ गया।
2007 में जांच में जो हेपेटाइटिस ई वायरस सामने आया था, आज भी पीलिया के रोगियों में यही वायरस पाया गया है। अगर उस समय सरकार ने एनआईवी के सुझाव पर अमल किया होता तो आज शहर के सैकड़ों लोग पीलिया जैसी जलजनित रोग की चपेट में आने से बच सकते थे।