(फाइल फोटो)
भोपाल। 75 दिन तक चलने वाले बस्तर दशहरा पर्व को दुनिया की सबसे लम्बी अवधि तक चलने वाले पर्व के रूप में जाना जाता है जो सावन महीने की अमावस्या अर्थात हरियाली अमावस्या के दिन प्रारंभ होता है और अश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के दिन इस का समापन होता है। बस्तर में दशहरा पर्व देश के अन्य हिस्सों में मनाए जाने वाले रावण वध की परंपरा से हटकर दंतेरी देवी के शक्ति स्वरूप की आराधना और अर्चना के रूप में मनाया जाता है।
पर्व की शुरूआत में हरियाली अमावस्या को लकड़ियों के लट्ठे जगदलपुर शहर स्थित देवी दंतेरी के मंदिर के पास लाए जाते हैं। जिनसे रथ बनाया जाता है। इस दिन को पाटजात्रा के रूप में जाना जाता है। लकड़ियों की पूजा अर्चना की जाती है। दंतेरी देवी की दंतेवाड़ा विदाई के साथ ही यह बस्तर दशहरा के पर्व समाप्त होता है।
अस्सी से ज्यादा पूजन
75 दिनी इस आयोजन के दौरान एक ओर जहां 80 से अधिक पूजन विधान संपन्न किए जाते हैं वहीं इस दौरान 75 से अधिक बकरों की बलि भी दी जाती है. बकरों के अलावा मुर्गे, मोंगरी, मछली, अंडे और देशी शराब का भी उपयोग परपंरा अनुसार होता है. इस अवधि में दर्जन भर से अधिक पूजन विधानों में अलग-अलग निर्धारित संख्या में बकरों की बलि दी जाती है। 11 बकरों की बलि अश्विन शुक्ल अष्टमी की मध्य रात्रि को निशा जात्रा विधान के मौके पर दी जाती है।
इस दौरान तीन हजार नारियल, 5 हजार लीटर देशी शराब और 400 क्विंटल चावल उपयोग में औसतन प्रतिवर्ष लाया जाता है।
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