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गेहूं के दाने

7 वर्ष पहले
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कहां मुट्‌ठी में बंद

मेरा उजाला



देश के क्याक्या

बदलेंगे नजारे

ये जो इशारे



उड़ान भरो

आकाश पलट दो

औ\\\' उलट दो



दर्द मुझ में

किस से कहूं जो था

आंसू खंू जो था

खम तेरे की

गुत्थी बस सुलझी

सदा उलझी



सर्द पहाड़

मां सी लिपटी धूप

अपर्णा रूप



समय तू भी

करवट बदल

तू दुर्बल



पृथ्वी है सिर

झुकी पीठ झड़ी

सच में अड़ी

मूंदाे आंख

दुर्निवार खंूखार

लेगा आकार



तिरछी भवें

कंपन विशेष की

तनी शेष की



भाषा आईना

मैं दिखा विकलांग

ओ! मेरी टांग



संपर्क: श्री राम कृष्ण भवन, अनाडेल

शिमला 171003

गेहूं के दाने

खलियान में पड़े हैं/सुस्ता रहे हैं

एक ओर बैठे बैल

छांव में जुगाली करते

थके किसनू ने

सुलगा लिया है हुक्का

उसकी सारी थकान/ हुक्के के धुएं में

मानो उड़ी जा रही है।

इधर-उधर आम जामुन

बेर तथा बांस के पेड़ों पर बैठी

चिड़ियाएं/ अचानक चली आई हैं

दाना चुगने।

चिड़ियाएं दाना चुग रही हैं

समीप बैठा किसनू सोच रहा है

दाने-दाने पर लिखा है

खाने वाले का नाम।

वह इन दानों को सहेजकर

घर में ले जाएगा

कुछ क्विंटल रखेगा

शेष बाजार में जाकर बेच आएगा।

यह दाने

पिसकर आटा बन जाएंगे

जाने कौन-कौन इन्हें खाएगा?

अपने पेट की आग बुझाएगा।

संपर्क : हिमालय जैव संपदा, प्रौद्योगिकी संस्थान, पालमपुर-176061, हिप्र

हाइकु

कविता