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िहमाचल में भी खुलनी चाहिए अकादमियां

7 वर्ष पहले
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अंग्रेजी के प्रवक्ता होने के बावजूद आप हिंदी में भी लिखते हैं?

बचपनसे ही कविता लिखने का शौक था। प्रसाद, पंत और निराला को पढ़ने के बाद तुकबंदी में कविता लिखी और आज खड़ी बोली में कविताएं लिखता हूं।

आजगद्य और पद्य में कौन पाठक को ज्यादा आकर्षित कर रहा है?

गद्यज्यादा पढ़ा जाता है, उसमें भी कहानियां। खासकर लघु कथाएं ज्यादा पढ़ी जाती हैं। कविता या उपन्यास एक सीमित वर्ग ही पढ़ता है। हिमाचल में नाटक विधा खतम ही होती जा रही है। ऐसे आयोजन होने चाहिए कि यहीं के कहानीकारों की कहानियों पर कोई नाटक लिखा जाए। गेयटी में जो नाटक होते हैं वह अधिकतर पुराने हैं। सरकार कुछ ऐसा प्रयास करने चाहिए कि यहां के लेखकों को स्क्रिप्ट लिखवाएं और मंचन भी खुद करवा सकते हैं। इसमें नाटकों में नयापन आएगा और दर्शक् भी जुड़ेंगे।

हिमाचलसे लगातार साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं लेकिन साहित्य मुख्यधारा में नहीं पा रहा है इसका क्या कारण मानते हैं?

इसकेकई कारण हैं। एक तो यह कि यहां पत्र-पत्रिकाओं की कमी है। कुछ निकलती हैं लेकिन फंडिंग होने के कारण वे मुकाम तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती हैं। दूसरी ओर सरकार की उदासीनता भी इस क्षेत्र में नजर आती है। कुछ पत्र-पत्रिकाएं निकलती हैं लेकिन वे पाठकों से जुड़ नहीं पा रही हैं। पुस्तकालयों की कमी भी एक कारण माना जा सकता है। प्रकाशकों की कमी तो है ही। जो हैं भी उनकी हालत दयनीय हैं। प्रकाशक हैं तो वितरक नहीं हैं। दूरदराज के क्षेत्रों में तो पुस्तकालय हैं ही नहीं। पुस्तकालयों के पास भी सीमित फंड हैं इसलिए एक लेखक की मुश्किल से 10-12 किताबें ही बिक पाती हैं। ऐसे में पढ़ने का माहौल नहीं बन पा रहा है।

क्याआप मानते हैं कि पाठक साहित्य पढ़ना चाहते हैं

साहित्यछपेगा तो निसंदेह पढ़ा जाएगा। दैनिक समाचार पत्रों से भी साहित्य की जगह सिकुड़ती जा रही है। खेल परिसर की तरह स्टेट लाइब्रेरी खुलनी चाहिए ताकि पढ़ने का माहौल बन सके।

क्याआप मानते हैं हिमाचल में साहित्यकारों की गुटबंदी है?

गुटबंदीसे इनकार नहीं किया जा सकता, यह साहित्य के हित में नहीं है। लेकिन अब गुट कहां रह गए अब तक साहित्यकार अकेले हो गए हैं। जो साहित्य के लिए बड़ा खतरा है। एक कॉमन प्लेटफार्म होने से गुटबाजी कम होगी। इससे साहित्य फलेगा।

सरकारीस्तर पर या संस्थाएं भी साहित्यिक आयोजन करती