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कुल राजीव पंत की कविताएं

7 वर्ष पहले
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सुबह से ड्यूटी पर निकला सूरज

थका हारा

देर शाम घर पहुंचा

नदी किनारे पानी की

सूखी परत पर बैठा

बैठे-बैठे

ऊंघते-ऊंघते

वहीं लुढ़क गया

रात के आने की

पहली आहट

वहीं पर हुई।





बर्फ

बर्फके कुछ फाहे

चुराकर आसमां से

उसने मेरी हथेली पर

रख दिए थे

एक मौसम

उड़ रहा था

चारों तरफ

एक रिश्ता हथेली से

पिघल कर

बह रहा था।

पहाड़

जानेकिसकी नजर

लग गई पहाड़ को

डरा-डरा और

घबराया रहता है

मां होती तो

काला टीका लगा देती

पहाड़ के माथे पर



पीठ

पहाड़सी जिंदगी

ढोती है

पहाड़ी औरत

अपनी पीठ पर।

पहाड़ की पीठ पर

चलते, रुकते, बैठते

और कभी - कभी

उससे बतियाते हुए।



बर्फबारी

बर्फबारी

पहाड़ों के

फेशियल की तैयारी

संपर्क:प्लैजैंटराजीव पंत

संजौली, शिमला-171006