त्योहार खोता जा रहा वास्तविक रूप
ठियोग|ठियोग सहितअपर शिमला में साल के सबसे बड़े त्यौहार महाशिवरात्रि को लेकर अब पहले जैसा उत्साह नहीं रहा है। हर साल इस त्यौहार का वास्तविक रूप खोता जा रहा है और अब यह मात्र औपचारिकता में बदलने लगा है। इस साल यह त्यौहार 17 फरवरी को है। अब दुकानों पर पहले की तरह खरीददारी होती है ही इस त्यौहार की परंपराओं को उस प्रकार से निभाया जाता है। पहले इस त्योहार के लिए 15 दिन पहले से दुकानों पर सामग्री सज जाती थी। कुछ दशक पहले तक शिवरात्रि के त्यौहार के लिए दुकानों पर गुड़ और तेल के ढेर लग जाते थे। एक माह तक इस त्यौहार की रौनक रहती थी। ग्रामीण अपने घरों में अपनी बहन बेटियों को बांटने के लिए ढेरों पकवान बनाते थे और कई दिनों तक इन्हें किल्टू में डालकर बांटा जाता था। शिवरात्रि के लिए हर घर में तेल के टिन ले जाए जाते थे और बड़ी मात्रा में गुड़ आदि खरीदा जाता था। लेकिन अब पकवानों की जगह नकद रुपये बांट कर ही यह परंपरा निभाई जा रही है।
शिवपार्वती के विवाह का दिन
शिवरात्रिका त्यौहार पुराणों के अनुसार कैलाश में बसने वाले भगवान शिव और हिमाचल की बेटी देवी पार्वती के विवाह के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। हिमाचल के लोग इस दिन देवी पार्वति के अभिभावकों की भूमिका निभाते हैं। शिवरात्रि से पहले की पूर्णिमा से इस त्यौहार का शुभारंभ हो जाता है।
बांटनेकी परंपरा
शिवरात्रिके दिन व्रत रखकर रात में भगवान शिव की अराधना की जाती है। शिव पार्वती की मिट्टी की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं और गोबर के गणेश बनाए जाते हैं। इनकी पूजा अर्चना होती है। हर घर में गुड़,आटे और तेल से पकेन बनाए जाते हैं। कई तरह की खाने पीने की चीजें बड़ी श्रद्धा से बनती हैं। शिवरात्रि पर भांग से बने पकौड़े भी बनाए जाते हैं।