िवभाग नहीं कर रहा मूर्तियों का पंजीकरण
प्रदेशके मंदिरों में रखी बहुमूल्य मूर्तियों का पुरातत्व विभाग पंजीकरण नही कर पा रहा है। ऐसे में अगर मंदिरों से रखी बहुमूल्य मूर्तियां चोरी हो जाती है तो पंजीकरण के बिना उन्हे ढूंढना मूश्किल भरा हो जाता है। पंजीकरण में विभाग को मूर्ति की फोटो सहित उसका पूरा ब्योरा लिखा जाता है इसमें उन सभी जानकारियों को शामिल किया जाता है जो मूर्ति से जुड़ी हुई होती है। मूर्ति कब की बनी है, मूर्ति का क्या आकार है, वह किस धातु से बनी है,उसका वजन कितना है, उसकी चौड़ाई कितनी है, किस शैल में मूर्ति को बनाया गया है आदि कई बातों को लेकर मूर्ति का पंजीकरण किया जाना बेहद जरूरी है। मूर्तियों या अन्य कीमती सामान जैसे धरोहर ,सिक्का,धातु सोना चांदी ,काष्ठ जो प्रदेश की बहुमूल्य धरोहरें है उनका पंजीकरण किया जाना बेहद जरूरी है। इसका एंटी क्वीटीस अार्टिज एक्ट 1979 में भी प्रावधान किया गया है।
नहींहो रहा पालन
प्रदेशमें इस एक्ट का सख्ती से पालन नहीं हो पा रहा है। मूर्तियों का पंजीकरण किये जाने के बाद उसकी एक कॉपी भाषा एवं संस्कृति विभाग के पास ,एक कॉपी संबंधित पुलिस थाना में और एक कॉपी संबंधित मंदिर ट्रस्ट ,गुर ,संस्था,संगठन के पास दी जाती है। लेकिन एसा हो नहीं रहा पुलिस के पास मूर्तियों का पूरा सही रिकार्ड होने की वजह चोरी की गयी मूर्तियों को ढूंढ पाना मुश्किल भरा हो रहा है। हालांकि सरकार चोरी की गयी मूर्तियों को ढूंढने के लिए इंटरपोल पर अलर्ट करती है लेकिन जानकारों की माने तो इंटरपोल पर भी अलर्ट के तभी मायने होंगे अगर चोरी की गयी मूर्ति को पंजीकरण की रिपोर्ट सहित डाला जाए जिससे मूर्ति को ढूंढने का काम आसान हो सके।
प्रदेश में इस समय तीन हजार से अधिक मंदिर है जो निजी क्षेत्र में है इनमें रखी बहुमूल्य मूर्तियां आज भी चोरो के निशाने पर है। हर साल यहां चोर मंदिरों में हाथ साफ कर करोड़ों की बहुमूल्य मूर्तियों को चुरा कर ले जा रहे है। जिनमें से काईयों का पता चल जाता है और कई मूर्तियों का आज तक कोई सुराग हाथ नहीं लग पाया है।
29मंदिर हंै सरकार के अधीन
प्रदेशमें 29 मंदिर ही इस समय सरकार के अधीन है। अधिकारियों का दावा है कि विभाग ने उन मंदिरों में रखी मूर्तियों को ही पंजीकृत किया हुआ है। जबकि तीन हजार मंदिरों में आज भी कई मूर्तियां इतनी बेशकीमती है जिनकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में खूब मांग है।
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