सरकार को गुमराह कर रहे आरक्षित कर्मचारी
प्रदेशमें अनुसूचित जाति, जनजाति एवं ओबीसी कर्मचारियों की तो पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था सरकार ने बंद की है और ही 85वां संविधान संशोधन लागू होने से नौकरियों में आरक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्व गिर रहा है। हिमाचल प्रदेश अनुसूचित जाति, जनजाति अन्य पिछड़ा वर्ग कर्मचारी कल्याण महासंघ झूठी बयानबाजी कर केवल सरकार को गुमराह कर रहा है। यह कहना है हिमाचल प्रदेश सामान्य वर्ग कर्मचारी कल्याण महासंघ के प्रदेशाध्यक्ष भगत राम ठाकुर और महासचिव भूतेश्वर चौहान का। उन्होंने महासंघ के बयान को आधारहीन एवं तथ्यहीन बताया है। उन्होंने कहा कि आर्थिक एवं सांख्यिकीय विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो प्रदेश में वर्ष 2015 में कुल 1.85 लाख कर्मचारियों में 21.8 प्रतिशत कर्मचारी अनुसूचित जाति तथा 6.8 प्रतिशत कर्मचारी अनुसूचित जनजाति से हैं। आंकड़ों में साल दर साल बढ़ोतरी हो रही है। बावजूद इसके यह कहना गलत है कि प्रदेश में आरक्षित वर्ग के लिए पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था सरकार नहीं दे रही है। हिमाचल प्रदेश सामान्य वर्ग कर्मचारी कल्याण महासंघ के उपाध्यक्ष प्रेम प्रकाश वर्मा, अनिल शर्मा, प्रेस सचिव जीआर भारद्वाज, जिलाध्यक्ष बालक राम चंदेल और उपाध्यक्ष प्रकाश वर्मा ने कहा कि वर्तमान में प्रदेश अनुसूचित जाति एवं जनजाति के कर्मचारियों के कम प्रतिनिधित्व का प्रश्न ही पैदा नहीं होता है। इनको नियुक्तियों तथा पदोन्नतियों में निर्धारित प्रतिशत के अनुसार सरकार द्वारा आरक्षण दिया जा रहा है। जो आरक्षित वर्ग के कर्मचारी सामान्य श्रेणी की मैरिट में आते हैं उन्हें सामान्य श्रेणी में नियुक्त किया जाता है। ऐसे में आरक्षित वर्ग के कर्मचारी तय प्रतिशत से अधिक नियुक्ति हो रहे हैं। हिमाचल प्रदेश सामान्य वर्ग कर्मचारी कल्याण महासंघ ने 17-6-1995 से पदोन्नतियों में दिए जा रहे असंवैधानिक आरक्षण को समाप्त करने तथा सामान्य वर्ग के लिए हाई-पावर आयोग गठित करने की मांग सरकार से की है। वहीं प्रधानमंत्री से मांग की है कि अन्य वर्गों के लिए गठित आयोग की तरह ही सामान्य वर्ग की स्थिति के आकलन एवं सिफारिश के लिए सामान्य वर्ग के आयोग का गठन किया जाए।