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हाईकोर्ट के फैसले के बाद देवसंसद ने भी लिया फैसला, कहा नहीं छोड़ेंगे बलि प्रथा

7 वर्ष पहले
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कुल्लू। देवभूमि कुल्लू के देवी देवताओं ने आखिर बलि प्रथा को लेकर अपना फैसला सुना दिया है। इसके लिए बाकायदा जिला के नग्गर में देव संसद बुलाई गई। इसमें कुल्लू जिले के साथ साथ लाहौल-स्पीति और मंडी देवी देवताओं ने भी भाग लिया। देवी-देवताओं ने एकमत से कहा कि वे पुरानी रिवायत को नहीं छोड़ेंगे, नए रिवाज को नहीं अपनाएंगे।
उन्होंने कहा, "हमने दुनिया का निर्माण किया है और मानव सभ्यता बसाई है, लेकिन आज मानव हमें अपने नियमों में बांधना चाहते हैं। हम किसी के बंधन में नहीं बंधने वाले। सबसे पहले नग्गर स्थित त्रिपुरा सुंदरी के मंदिर में सभी देवी देवताओं के गुर, कारदार, पुजारी आदि ने अपने अपने देवी देवताओं के निशानों के साथ दस्तक दी और उसके बाद देव कारज शुरू हुआ। भगवान रघुनाथ जी के छड़ीबरदार महेश्वर सिंह ने सभी देवी देवताओं के गुर के समक्ष जाकर पूछ ली और देव संसद में उपस्थित सभी देवी देवताओं ने एक ही स्वर में कहा कि वे नई प्रथा को शुरू न करें और पुरानी प्रथा को जारी रखें।

महेश्वर सिंह ने जगती पूछ की शुरूआत देवी त्रिपुरा सुंदरी के गुर से की और उसके बाद बासुकी नाग हलाण के देवताओं के गर ने कहा कि पुराने नियम का न छोडें उन्हें जारी रखें। जबकि जमलू देवता के गुर ने कहा कि पुरानी छोड़नी नीं और नौऊंई लाणी नी यानी पुरानी रीत को छोड़ना मत और नई को जोड़ना नहीं। देवता जमलू देवता ने भगवान रघुनाथ के छड़ी बरदार महेश्वर सिंह को आशीर्वाद देते हुए कहा कि चिंता करने की कोई बात नहीं है और हमारा आशीर्वाद पूरा बना रहेगा।
इधर, हाईकोर्ट में महेश्वर सिंह की याचिका रद्द
न्यायाधीश राजीव शर्मा आैर न्यायाधीश सुरेश्वर ठाकुर ने विधायक महेश्वर सिंह की आेर से दायर उस आवेदन को रद्द कर दिया, जिसके पशु बलि पर पाबंदीवाले आदेश को वापस लेने की गुहार लगाई थी। हाईकोर्ट ने सोनाली पुरेवाल की पशुबलि के खिलाफ दायर याचिका में अंतरिम आदेश पारित कर पशु बलि पर रोक लगा दी थी। दशहरा उत्सव को ध्यान में रखते हुए महेश्वर सिंह ने आवेदन दायर कर दोबारा विचार करने की गुहार लगाई थी। प्रदेश हाईकोर्ट ने सुनाली पुरेवाल की याचिका पर पशु बलि पर रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने पारित किया कि इसके तहत लंबे समय से धार्मिक स्थलों पर दी जानी वाली पशु बलि पर पूर्णतया प्रतिबंध लगा दिया है।
यह कहा था अदालत ने
हाईकोर्ट के सुनाए इस अहम फैसले में स्पष्ट किया गया है कि निर्दोष पशुआें को देवता के नाम पर मौत के घाट उतारना गलत है। इस तरह की प्रथाएं मूल रूप से किसी भी धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं हो सकती है। इसके तहत पशु को बलि के नाम पर निर्मम व भयानक तरीके से सार्वजनिक तौर पर मौत के घाट उतार दिए जाए। कोर्ट के समक्ष यह तथ्य ध्यान में लाए गए थे कि पूरे प्रदेश में किसी न किसी कारण को लेकर मंदिरों में पशु बलि का चलन प्रचलित है।