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रजिस्ट्रियों में हेराफेरी से राजस्व में लाखों की चपत, अधिकारी लगा रहे लाखों का चूना

6 वर्ष पहले
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शिमला। राजस्व विभाग के अफसरों की लापरवाही की वजह से राज्य सरकार को लाखों के राजस्व की हानि हुई है। शिमला शहर में पिछले दस सालों में 11417 जमीनों की रजिस्ट्रियां हुई हैं। जमीन की रजिस्ट्री करवाने व भूमि संपत्ति का मूल्यांकन सही तरह से न करने की वजह से सरकार को 59 लाख 91 हजार 715 रुपए का राजस्व नुकसान हुआ है। ऑडिट रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। ऐसे अधिकारियों के खिलाफ न तो विभागीय कार्रवाई हुई और न ही सरकार की ओर से इन पर कोई एक्शन लिया गया। ऑडिट में अनियमितता सामने आने के बाद मामलों का समाधान किया जा रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता कर्मचंद भाटिया द्वारा आरटीआई में ली गई सूचना में यह जानकारी जुटाई गई है। उन्होंने राज्य सरकार से मांग की है इस तरह के मामलों में संलिप्त अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए। राज्य में इस तरह की अनियमितताओं से करोड़ों रुपए का नुकसान हो रहा है।
एेसे करते हैं मिलीभगत

राजस्व विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों की मिलीभगत के चलते सरकार को राजस्व हानि उठानी पड़ती है। भूमि सौदों के दौरान अधिकारी जमीन की कीमत बाजारी भाव से कम आंकते हैं जिससे पंजीकरण शुल्क कम चुकाना पड़ता है। इसके अलावा कई बार किसी पार्टी को बिना किसी कारण के पंजीकरण शुल्क में छूट दी जाती है या फिर उनसे पंजीकरण शुल्क बिल्कुल भी नहीं वसूला जाता है। इससे से भी राजस्व हानि होती है।
वर्ष 2000- वर्ष 2000 में स्टाम्प शुल्क एवं पंजीकरण फीस न लगाने से 1 लाख 57 हजार 548 रुपए का नुकसान आंका गया है। इसके अलावा स्टाम्प शुल्क एवं पंजीकरण फीस की अनधिकृत माफी से 11500 रुपए की नुकसान हुअा है।
वर्ष 2001- वर्ष 2001 में विभिन्न पट्टा नामा विलेखों में स्टाम्प शुल्क एवं पंजीकरण फीस की कम वसूली से 40 हजार 840 रुपए की राजस्व हानि हुई है।
वर्ष 2007- वर्ष 2007 में स्टाम्प शुल्क में अनधिकृत छूट देने से 3 लाख 29 हजार 072 रुपए का नुकसान हुआ है।
वर्ष 2009- भू-संपत्ति का मूल्यांकन मार्किट रेट पर न करने से स्टाम्प शुल्क और पंजीकरण फीस की कम वसूल करने से 8 लाख 39 हजार 735 रुपए की राजस्व हानि आंकी गई है। इसके अलावा बंजर भूमि के नाम पर पंजीकरण करने से 14 लाख 98 हजार 049 रुपए, बाजारी कीमत से कम राशि पर भूमि का मूल्यांकन करने पर 1 लाख 77 हजार 705 रुपए की राजस्व हानि अंकित की गई है।
वर्ष 2010- पटवारियों द्वारा एक साला औसत कम कीमत दर्शाने से 8 लाख 45 हजार 868 रुपए, दूसरे महाल की एक साला औसत लगाने से 8 लाख 93 हजार 225 रुपए, भूमि की किस्म बदलने से 6 लाख 20 हजार 050 रुपए, भूमि का मूल्यांकन किस्म बार न करने से 1 लाख 99 हजार 800 रुपए, विलेखों के गलत वर्गीकरण से 92 हजार 400 रुपए की राजस्व हानि हुई है।
वर्ष 2011- पटवारियों द्वारा एक साला औसत वैल्यू कम दर्शाने से 5 लाख 11 हजार 495 रुपए की राजस्व हानि हुई है।
जमीन का सर्कल रेट तय- राज्य सरकार ने जमीन के रेट तय किए हुए हैं। हर सर्कल में रेट तय हैं। सर्कल रेट से कम में यदि रजिस्ट्री होती है तो ऑडिट पैरा में नुकसान आ जाता है। इससे नुकसान का पता चलता है। पहले पटवारी खुद जमीन के रेट तय करते थे। उनकी रिपोर्ट के आधार पर जमीन की रजिस्ट्री होती थी।