शिमला। टीसीपी एक्ट में संशोधन कर सरकार ने भवनों को रेग्युलर करने के लिए प्रक्रिया तो शुरू कर दी है, लेकिन अब लोगों को चिंता सता रही है कि इसमें आवेदन के लिए दस्तावेज कैसे जुटाएंगे। सड़क किनारे बने भवनों को रेग्युलर करवाने के लिए लोक निर्माण विभाग से एनआेसी लेनी होगी। इसकी प्रक्रिया लंबी आैर जटिल है।
दूसरी तरफ एक्ट में संशोधन का लाभ लेने के लिए भवन मालिक को 45 दिन में आवेदन करना होगा। इस अवधि के बाद के आवेदनों के विभाग स्वीकार नहीं करेगा। एेसे में राजस्व दस्तावेजों को जुटाने के साथ ही सरकारी विभागों से लेने वाले अनापति पत्रों को एकत्र करना परेशानी बना है। आर्किटेक्ट राजीव वर्मा ने कहा कि ये कार्यशाला में उठाया था। विभाग ने मामले को लोक निर्माण विभाग के समक्ष उठाने की सलाह दी, राहत के नाम पर आश्वासन तक नहीं दिया था।
टीसीपी की कार्यशाला
टीसीपी विभाग की आेर आयोजित कार्यशाला में भी वास्तुकारों ने भी यह मामला उठाया है। इस पर विभाग ने राहत देने की बजाय ये मामले वास्तुकारों को ही लोक निर्माण विभाग के समक्ष उठाने की सलाह दी थी।
ऐसे राहत संभव
इस मामले में लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों का कहना है कि विभाग यदि सिंगल विंडो सिस्टम के तहत कुछ दिनों के लिए एनआेसी की प्रक्रिया शुरू करता है तो हजारों भवन मालिकों को राहत मिलने की उम्मीद है।
तीन से छह महीने में भी नहीं मिलती है एनआेसी: आर्किटेक्ट
लोक निर्माण विभाग में भवन मालिकों को एनआेसी लेने के लिए लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। एनएच से एनओसी लेने के लिए तीन से छह माह तक चलने वाली एक लंबी और जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। एनएच के लिए तो एनआेसी के लिए चंडीगढ़ तक से अनुमति लेनी होगी। फाइल मूवमेंट इतनी लंबी है कि आम आदमी को एक साल तक का आैपचारिकता करने के बावजूद एनआेसी का इंतजार करना पड़ता है।
एनएच से एनआेसी
राष्ट्रीय उच्च मार्ग से अनापत्ति पत्र लेने के लिए शिमला जिले के भवन मालिक को पहले पूरे डाॅक्यूमेंट तैयार कर सोलन भेजना होता है। इसके बाद संबंधित जेई आैर एसडीआे से रिपोर्ट मांगी जाती है। इस रिपोर्ट के बाद पूरी फाइल चंडीगढ़ भेजी जाती है। वहां से लंबी प्रक्रिया के बाद ही सौ में से चार से पांच फीसदी आवेदकों को ही एनआेसी मिल पाती है।
स्टेट हाईवे से एनआेसी
स्टेट हाइवे के किनारे बने भवनों के लिए भवन मािलकों की एनआेसी के लिए एसई के पास से फाइल चीफ इंजीनियर तक आती है। इस पूूरी लंबी प्रक्रिया में रूटीन में ही तीन से चार महीने का समय कम से कम लगता है।