( फोटो- तरकुलहा देवी मंदिर के फाइल फोटो।)
शिमला। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले से 20 व चौरी-चौरा से पांच किलोमीटर की दूरी पर है पूरे विश्व में प्रसिद्ध तरकुलहा देवी मंदिर। कहा जाता है कि मंदिर में भक्तों द्वारा सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। इसी महीने की 25 तारीख से शुरू हो रहे शारदीय नवरात्र पर यहाँं श्रद्धालुओं की खूब भीड़ उमड़ती है। मंदिर अपनी दो विशेषताओ के कारण काफी प्रसिद्ध हैं।
पहला इस मंदिर से जुड़ा क्रांतिकारी बाबू बंधू सिंह का इतिहास
बात 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से पहले की है। इस इलाके में जंगल हुआ करता था। यहाँं से गुर्रा नदी बहती थी। जंगल में डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह रहा करते थे। नदी के तट पर तरकुल (ताड़) के पेड़ के नीचे पिंडियां स्थापित कर वह देवी की उपासना किया करते थे। तरकुलहा देवी बाबू बंधू सिंह कि इष्ट देवी थी।
गुलामी का दौर
गुलामी के उस दौर में हर भारतीय का खून ब्रितानी हुकूमत के जुल्म की कहानियां सुनसुनकर खौल उठता था। जब बंधू सिंह बड़े हुए तो उनके दिल में भी ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ आग जलने लगी। ऐसा कहा जाता है कि बंधू सिंह गुरिल्ला लड़ाई में माहिर थे, इसलिए जब भी कोई अंग्रेज उस जंगल से गुजरता, बंधू सिंह उसकी बलि मां दुर्गे को चढ़ा देते।
अंग्रेज बनते रहे मूर्ख
जब कई सैनिक जंगल में जाकर नहीं लौटे तो अंग्रेज यहाँ समझते रहे कि सिपाही जंगल में जाकर लापता हो जा रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें भी पता लग गया कि अंग्रेज सिपाही बंधू सिंह के हाथों बलि चढ़ाएं जा रहे हैं। फिर क्या था अंग्रेजोंं ने बंधू सिंह की तलाश में जंगल में एक बड़ा तलाशी अभियान चला दिया। लाख तलाश के बाद भी बंधू सिंह उनके हाथ नहीं आए। उस समय भी गद्दारों की कोई कमी नहीं थी, एक व्यवसायी की मुखबिरी के चलते बंधू सिंह को अंग्रेजोंं ने पकड़ लिया।
छह बार फांसी पर चढ़ाएं जाने के बाद भी बच गए
अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया जहां उन्हें फांसी की सजा सुनाई गयी। 12 अगस्त 1857 को गोरखपुर में अली नगर चौराहा पर सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटकाया गया। बताया जाता है कि अंग्रेजोंं ने उन्हें 6 बार फांसी पर चढ़ाने की कोशिश की लेकिन वे सफल नहीं हुए। इसके बाद बंधू सिंह ने स्वयं देवी माँ का ध्यान करते हुए मन्नत मांगी कि माँ उन्हें जाने दें। कहते हैं कि बंधू सिंह की प्रार्थना देवी ने सुन ली और सातवीं बार में अंग्रेज उन्हें फांसी पर चढ़ाने में सफल हो गए। अमर शहीद बंधू सिंह को सम्मानित करने के लिए यहाँँ एक स्मारक भी बना हैं।
दूसरी विशेषता मिलता है मटन बांटी का प्रसाद
यह देश का इकलौता मंदिर है जहाँ प्रसाद के रूप में मटन दिया जाता हैं। बंधू सिंह ने अंग्रेजों के सिर चढ़ा के जो बलि कि परम्परा शुरू की थी वो आज भी जारी है। अंतर इतना है कि अब यहाँँ पर बकरे कि बलि चढ़ाई जाती है उसके बाद बकरे के मांस को मिट्टी के बरतनों में पका कर प्रसाद के रूप में बांटा जाता हैं साथ में बाटी भी दी जाती हैं।
बलि पर विवाद, भरता है मेला
वैसे तो पुराने समय में देवी के कई मंदिरों में बलि कि परम्परा थी लेकिन समय के साथ साथ लगभग सभी जगह से यह परम्परा बंद कर दी गयी लेकिन तरकुलहा देवी के मंदिर में यह अब भी चालू है हालाकि इस पर अब काफी विवाद है और इसे बंद कराने के लिए कोर्ट में केस भी चल रहा हैं। तरकुलहा देवी मंदिर में साल में एक बार मेला भरा जाता हैं जिसकी शुरुआत चेत्र रामनवमी से होती हैं यह मेला एक महीने चलता हैं। यहाँँ पर मन्नत पूरी होने पर घंटी बांधने का भी रिवाज़ हैं, यहाँँ आपको पुरे मंदिर परिसर में जगह जगह घंटिया बंधी दिख जायेगी। यहाँँ पर सोमवार और शुक्रवार के दिन काफी भीड़ रहती हैं।
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