इतिहास में एक ऐसी भी अवस्था थी, जब स्त्री-पुरुष के बीच यौन संबंध के सामाजिक नियम नहीं बने थे और न ही यौन शुचिता और नैतिकता का बोध विकसित हुआ था। यौन क्रिया में रिश्ते-नाते नहीं देखे जाते थे, क्योंकि ऐसे संबंध उन दिनों बने ही नहीं थे। किसी भी स्त्री के साथ सेक्स करना, पशुओं की तरह कहीं भी खुले में संबंध बनाना, अल्पवयस्क बालिकाओं को साथ संभोग करना और यहां तक कि पशुओं के साथ यौन क्रीड़ा करना आम बात थी। सेक्स स्वच्छंद एवं निर्बंध था।
सभ्यता के विकास के साथ सेक्स के संबंध में सामाजिक रीतियां विकसित हुईं और नैतिक मानदंड स्थापित हुए। इसे हम ऐतिहासिक समाजशास्त्रीय संदर्भ में समझ सकते हैं।
(अंदर की स्लाइड में देखेंगे कि कैसे सेक्स हमारे समाज का अभिन्न अंग था...)
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