12 मार्च, 1993 की घटनाओं से मुल्क, नागरिकों और सरकार को गहरा सदमा पहुंचा था, लेकिन विचलित होने वालों में सिर्फ यही नहीं थे। दाऊद इब्राहिम भी उस मनहूस दिन की घटनाओं से बुरी तरह हिला हुआ था। हालांकि इस बात का कोई वास्तविक प्रमाण नहीं है जो यह बता सके कि उसकी उस मानसिक हालत की क्या वजह थी। उसके दोस्तों और सहयोगियों का खयाल है कि जब उसने पाकिस्तान की आईएसआई को महाराष्ट्र के लंबे तट के रास्ते आरडीएक्स की तस्करी के लिए साधनों की मदद मुहैया कराई थी, तब उसे भी अनुमान नहीं था कि वे हिंदुस्तान की जमीन पर इतने बड़े पैमाने का आतंकवादी कृत्य करने जा रहे हैं।
दाऊद का खयाल था कि योजना उस तरह के ‘चुभाओ और खून रिसने दो’किस्म के अभियान की है, जो कश्मीर के इलाके में आईएसआई का करीब-करीब विजिटिंग कार्ड जैसा बन चुका है, जहां पर आए दिन जान-माल के नुकसान की छोटे स्तर की घटनाएं देखने को मिलती हैं। अपने सफेद दुर्ग के सिंहासन पर आसीन इस सर्वद्रष्टा, सर्वज्ञाता डॉन को जैसा कि उसके करीबी लोग बताते हैं, जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह अभियान दुनिया के तब तक के सबसे जघन्य आतंकवादी हमले की शक्ल लेने वाला है।
ग़मजदा दाऊद इस दुष्चक्र से बाहर निकलकर अपने बेदाग़ होने का सबूत देना चाहता था। वह अपनी बेगुनाही का इसरार करना चाहता था और लोगों को यकीन दिलाना चाहता था कि वह इन धमाकों के लिए जिम्मेदार नहीं है। विडम्बना यह थी कि कभी जिस डॉन के साथ मुलाकात का समय मिलना लगभग असंभव होता था, इस वक्त उसकी बात धीरज के साथ सुनने वाला कोई नहीं था। दुबई में, जहां पर वह उस वक्त रहता था, नफरत से भरी डाक का अंबार लगता जा रहा था। उस पर ‘कौम गद्दार’ और ‘मुल्क गद्दार’ जैसे खिताब बरसाए जा रहे थे। इख्तिलाफ़ के अंधड़ में फंसा हुआ दाऊद गुस्से और नफ़रत से भरे ये दो-एक ख़त ही मुश्किल से पढ़ पाता और अपनी उदासी के आलम में गर्क हो जाता।
इस घटना के कुछ ही दिनों बाद की बात होगी जब दाऊद को इस बात का एहसास हुआ कि गुस्से और नफ़रत से भरे इन ख़तों को भेजने वाले किसी एक संप्रदाय तक सीमित नहीं थे, उनका ताल्लुक हर मजहब, हर कौम से था और उनमें भी सबसे ज़्यादा उसके अपने मुसलमान भाई थे। दरअसल, धमाकों के अगले ही दिन उसको मुंबई हवाईअड्डे पर तैनात एक मराठी महिला पुलिस अधिकारी का फोन आया। जब उसके एक सहयोगी ने उसको फोन लाकर दिया तो, दाऊद उसकी गुस्से भरी खरी-खोटी तकरीर सुनने की हालत में नहीं रह गया। ‘बेशर्म! तुझे शरम नहीं आती है? जिस मिट्टी पर तूने जन्म लिया, उसी मिट्टी को बदनाम किया!’
वह ऑफिसर फोन पर चिल्ला रही थी। दाऊद के पास कहने को कुछ नहीं था, वह खामोश सुनता रहा। इस हमले ने उसको इस कदर सकते में ला दिया कि फोन खत्म हो जाने के बहुत देर बाद तक वह उसको कान से लगाए रहा। जैसे कि इतना भर काफ़ी नहीं था कि उसका डाक का डिब्बा नफ़रतों से भरा हुआ था, अब तो यह नफ़रत उस तक फोन के मार्फ़त भी पहुंच रही थी।
मुसलमान भी इस कदर गुस्से में थे, इस बात ने उसको हैरान कर दिया था। आखिरकार यह एक दस्तावेजी सच्चई थी कि जब 1992-93 में मुंबई में हिंदू-मुस्लिम हिंसा भड़क उठी थी, तब दाऊद ने इस सांप्रदायिक उकसावे पर की जा रही कार्रवाई में घसीटे जाने से साफ मना कर दिया था। तभी यह हुआ था कि उसको दुबई के अपने व्हाइट हाउस विला में ‘तोहफे’ मिलने शुरू हुए थे, इनमें से कुछ रहस्यमय नजरानों में टूटी हुई चूड़ियों के डिब्बे भी शामिल थे, जिनके साथ एक नोट लगा होता था, ‘ये उस भाई के लिए जो अपनी बहन की हिफ़ाजत न कर सका।’
उस वक्त हथियार न उठाने के लिए उसका मजाक उड़ाया गया, झिड़का गया और अब इस वारदात में कथित रूप से शामिल होने के लिए वह पूरी दुनिया की नजरों में एक गद्दार था। यह एक विकट परिस्थिति थी। दाऊद घंटों बैठकर हर विकल्प पर विचार करता रहा। उसने पाया कि ये विकल्प तेजी से कम होते जा रहे हैं। आखिरकार उसने अपनी चाल चलने का फैसला किया और अपने एक सहयोगी से फोन लेकर आने को कहा।
धमाकों के काफी समय बाद तक का दाऊद वक्त उसकी कल्पना से परे कई तरह की मुश्किलों से भरा था। उसने अपने पुलिस संपर्को का इस्तेमाल कर अपने ऊपर लगे आरोपों की तादाद और सबूतों की मजबूती की जानकारी हासिल की। उसने पाया कि मुंबई पुलिस अपनी तमाम उठा-पटक और जांच-पड़ताल के बावजूद उसके खिलाफ खतरनाक टाडा अधिनियम के अंतर्गत सिर्फ दो इक़बालिया बयान ही उगलवा पाई है। (बाद में सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इंवेस्टिगेशन को एक और इक़बालिया बयान हासिल हुआ था, जो दाऊद का नाम इस षड्यंत्र से जोड़ता था।) सारे बयान इस तथ्य पर अपना वक्त बर्बाद करते थे कि दाऊद इस षड्यंत्र में शरीक था और उसने इन धमाकों को अंजाम देने के लिए टाइगर मेमन को संसाधन मुहैया कराने की सहमति दी थी, लेकिन दाऊद ने पाया कि यह कोई ऐसा सख्त मामला नहीं है और वह अदालत में आसानी से अपना बचाव कर सकता है।
दाऊद हिंदुस्तान के शीर्षस्थ वकील राम जेठमलानी की ख्याति से अच्छी तरह वाकिफ़ था। अगर कोई उसको इस पचड़े से बाहर निकाल सकता था, तो वह जेठमलानी ही थे, इसलिए डॉन ने इस वकील से उसके लंदन स्थित घर पर फोन करने का फैसला किया। यहां-वहां की बातों में वक्त बर्बाद किए बग़ैर दाऊद ने मुख्तसर और सीधे-साधे लफ़्जों का इस्तेमाल किया। ‘मि. जेठमलानी, मैं आत्म-समर्पण करना चाहता हूं,’उसने सहज और विनम्र स्वर में कहा।
आगे की स्लाइड्स में पढ़िए पूरा लेख...
(डोंगरी से दुबई तक — मुंबई माफ़िया के छह दशक पुस्तक से साभार...)
अंतरराष्ट्रीय जगत की अन्य खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। आप हमसे फेसबुक और ट्विटर पर भी जुड़ सकते हैं। यहां क्लिक करके डाउनलोड करें हमारी मोबाइल एप्लीकेशन।