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इजरायल के सबसे बड़े दुश्मन की मौत यूं बनकर रह गई राज

Dainik Bhaskar

Nov 11, 2014, 12:10 AM IST

स्विटजरलैंड के वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि उनके शव के अवशेषों में रेडियोधर्मी पोलोनियम-210 मिला था।

फलस्तीनी नेता यासिर अराफात की जिंदगी से जुड़े कुछ तथ्य
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फाइल फोटो: फलस्तीनी नेता यासिर अराफात।
इंटरनेशन डेस्क। जब भी कभी फलस्तीन की बात होती है, तो वहां के नेता के तौर पर आज भी एक ही व्यक्ति की छवि सामने उभरती है, वो हैं यासिर अराफात। उनकी मौत हुए आज दस साल का वक्त गुजर चुका है। यासिर फलस्तीनियों की उम्मीद का प्रतीक थे। इन्होंने 1964 में कई संगठनों को मिलाकर फलस्तीन मुक्ति संगठन यानी पीएलओ बनाया। इसका मकसद फलस्तीनियों के अधिकार हासिल करना था। इसके बाद 1968 में अराफात पीएलओ के मुखिया बन गए।
अराफात के नेतृत्व में उनके संगठन ने शांति की जगह संघर्ष को बढ़ावा दिया और इजरायल हमेशा उनके निशाने पर रहा। लोगों को बंधक बनाना, विमानों के अपहरण समेत दुनियाभर में इजरायल के ठिकानों पर निशाना साधना संगठन का मकसद बन गया था। वो इजरायल के अस्तित्व के सख्त खिलाफ थे, लेकिन शांति से दूर संघर्ष की पहल करने वाले अराफात की छवि 1988 में अचानक बदली हुई दिखी। वो संयुक्त राष्ट्र में शांति के दूत के रूप में नजर आए। बाद में उन्हें शांति के नोबेल पुरस्कार से भी नवाजा गया।
अराफात की मौत
फलस्तीनियों की उम्मीदों का प्रतीक बन चुके अराफात की मौत की खबर 11 नवंबर, 2004 को आई। बताया गया कि बीमारी की वजह से उनकी मौत हुई। कुछ समय बाद ही उनकी मौत को लेकर इजरायल पर जहर देने के आरोप लगे। इसके बाद ये सवाल खड़ा हो गया कि उनकी मौत प्राकृतिक थी या जहर के चलते हुई थी।
जांच के लिए उनके शव को कब्र से भी निकाला गया था और स्विटजरलैंड के वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि उनके शव के अवशेषों में रेडियोधर्मी पोलोनियम-210 मिला था। हालांकि, उनकी मौत लोगों के लिए अब भी एक पहेली ही बनी हुई है। आगे हम अराफात की जिंदगी से जुड़े ऐसे ही कुछ दिलचस्प वाकयों और घटनाओं के बारे में बताने जा रहे हैं।
आगे जानिए, यासिर अराफात की जिंदगी से जुड़ी घटनाओं और वाकयों के बारे में...

फलस्तीनी नेता यासिर अराफात की जिंदगी से जुड़े कुछ तथ्य
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नेहरू-गांधी परिवार से करीबी

फलस्तीनी नेता यासिर अराफात की नेहरू-गांधी परिवार के बहुत करीबियां थीं। इंदिरा गांधी को वो अपनी बड़ी बहन मानते थे। उन्होंने भारत में 1991 के चुनाव अभियान के दौरान राजीव गांधी को जानलेवा हमले को लेकर आगाह किया था। 
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खाली पिस्तौल रखते थे अराफात
 
यासिर अराफात हमेशा पिस्तौल रखते थे। वो पिस्तौल बड़ी ही लापरवाही से रखते थे। एक बार किसी ने उन्हें पिस्तौल निकालने के खतरे को लेकर आगाह किया, तब उन्होंने का खुलासा कि वो अपने दुश्मनों को डराने के लिए सिर्फ खाली पिस्तौल रखते हैं। 
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दो दुश्मनों ने मिलाया हाथ
 
दो कट्टर दुश्मन इजरायल के प्रधानमंत्री यितजाक राबिन और यासिर अराफात ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर वाशिंगटन के व्हाइट हाउस में तब हाथ मिलाया था, जब अरब और इजरायल के बीच शांति के लिए सिद्धांतों के एक घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर हुए। 
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अराफात की शादी 
 
अराफात के करीबियों ने बताया था कि वो शादी करने को बिल्कुल तैयार नहीं थे। अराफात हमेशा कहा करते थे कि उनकी शादी तो फलस्तीन से हो चुकी है। बाद में उन्होंने सुहा नाम की लड़की से शादी की, जो उम्र में उनसे काफी छोटी थीं। सुहा उन्हें बहुत पसंद करती थीं। सुहा ईसाई थी और अराफात सुन्नी मुसलमान। बाद में उन्हें एक बेटी हुई। 
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संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण
 
अराफात ऐसे पहले शख्स थे, जिन्हें किसी राष्ट्र का नेतृत्व न करते हुए भी संयुक्त राष्ट्र में भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया था। संघर्ष के पक्षधर अराफात महासभा में शांति के दूत के तौर पर नजर आए। उन्होंने कहा था कि उनके एक हाथ में शांति का प्रतीक जैतून की डंडी है और एक हाथ में स्वतंत्रता सेनानी की बंदूक। उन्होंने अपील की थी कि जैतून की डंडी उनके हाथ से न गिरने दें।
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