इंटरनेशनल डेस्क। दक्षिण अफ्रीका में एक दौर था जब नस्लीय भेदभाव चरम पर था। हर सुविधाएं रंग के आधार पर बंटी हुईं थी। बात चाहे बस में सीट की हो या फिर सार्वजनिक स्थल पर मिलने वाली सुविधाओं की। भेदभाव के इस देश में नेल्सन मंडेला ने रंगभेद विरोधी आंदोलन को दिशा दी और इस भेदभाव की नीतियों का खात्मा किया। इसी रंगभेद विरोधी आंदोलन के दौरान उन्हें 27 साल तक जेल में बंद रहना पड़ा। 1990 में आज ही के दिन यानी 11 फरवरी को वो जेल से छूटे थे।
मंडेला के इसी अंहिसावादी रवैए और गांधीवादी तौर-तरीकों के कारण उन्हें अफ्रीकी गांधी भी कहा जाता है। वर्ष 1993 में उनके इसी तेवर को सम्मान देते हुए उन्हें नोबेल के शांति पुरस्कार से नवाजा गया। मंडेला दक्षिण अफ्रीका की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाली पार्टी अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे थे। 1994 से 1999 के दौरान उन्होंने दक्षिण अफ्रीका की बागडोर भी संभाली थी।
(रंगभेद विरोधी आंदोलनकर्ता नेल्सन मंडेला 11 फरवरी 1990 में 27 साल बाद जेल से छूटे थे। इस मौके पर हम उनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ खास बातें बता रहे हैं।)
मंडेला जीवनभर रंगभेद विरोधी नीतियों के खिलाफ लड़ते रहे। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अश्वेतों को उनके अधिकार दिलाए। यह मंडेला के प्रयासों का ही नतीजा है कि आज दुनिया से नस्लीय भेदभाव पूरी तरह खत्म होने की कगार पर है।
आगे देखिए: समूचे विश्व में किस कदर हावी था नस्लीय भेदभाद।