दुनिया भर में खूब पढ़ी जाने वाली 'द अलकेमिस्ट' में पावलो कोएल्हो लिखते हैं कि अगर आपके इरादे नेक हैं और आप कुछ करना चाहते हैं तो पूरी कायनात आपके साथ होती है। ऐसा ही कुछ पाकिस्तान की वीरो कोल्ही के साथ भी है। 11 मई को होने वाले चुनावों में वीरो भी उम्मीदवार हैं।
उन्होंने चुनाव का नामांकन पर्चा भरते वक्त अपनी संपत्ति में दो बिस्तर, पांच गद्दे, खाने के बर्तन और सेविंग बैंक अकाउंट में 2800 रुपए को घोषित किए हैं।
वीरो कोई पेशेवर नेता नहीं हैं। वह एक बंधुआ मजदूर थी, जिसने जमींदार के यहां से मुक्त होकर अपने लोगों की भलाई के लिए चुनाव लड़ने का फैसला किया। अपने नाम के अलावा कुछ भी न लिख पाने वाली वीरो आधुनिक समय में गुलामी करने वालों की नेता बन कर उभरी है।
उनके पास दौलत की ताकत तो नहीं है, लेकिन गरीब वोटरों का भरोसा है, जो नेताओं के झूठे वादों से परेशान हैं। चुनावी अभियान में कोल्ही नई पहचान बन कर उभरी हैं। चुनावी अखाड़े में वे पहली ऐसी उम्मीदवार हैं, जो जागीरदार जैसे किसी जमींदार के चंगुल से भाग कर आई हैं।