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सबका रक्त एक तो अल्पसंख्यक के नाम पर अलग कैसे हो गए देशवासी : डा. सिन्हा

7 वर्ष पहले
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लोगोंके रक्त का रंग एक है फिर भी अल्पसंख्यक के नाम पर देशवासी अलग-अलग समुदाय में बंट गए हैं। जिसका एक मात्र कारण राजनीति है। यह बातें विनोबा भावे विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति प्रो. डाॅ. एमपी सिन्हा ने सेक्टर 5 स्थित आशालता केंद्र में चल रहे दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के समापन समारोह के अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि कही। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यक का मतलब सिर्फ मुस्लिम नहीं होता है। राज्य में सिख, जैन, बौद्ध, पारसी आदि कई एेसे समुदाय हैं जो अल्पसंख्यक हैं। झारखंड में सरकार द्वारा चलाई जा रही अल्पसंख्यकों के लिए योजना का लाभ उन तक नहीं पहुंच पा रही है। इस कारण पिछड़ेपन की स्थिति बनी हुई है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का अलख जगाएंगे तो अपने आप लोगों के बीच एक दूसरे के प्रति भेदभाव की भावना खत्म हो जाएगी।

राजनीति से प्रेरित है अल्पसंख्यक शब्द

दोदिवसीय सेमिनार के अंतिम दिन अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के डा. मो. सज्जाद तथा जेएमआई दिल्ली से आए प्रो. रिजवान कैशर ने सेमिनार को संबोधित करते हुए कहा कि अल्पसंख्यक शब्द ही राजनीति से प्रेरित है। सत्ता प्राप्ति के लिए अल्पसंख्यकों का इस्तेमाल सियासतदान करते रहे हैं। जबकि सभी समुदायों की समस्या एक है। मगर लोगों को आपस में बांट जरूर देते हैं। यह तो समझना है अब देशवासियों को कि वे इन राजनीतिज्ञों के चक्कर में नहीं पड़े। अन्यथा वे भटकाते रहेंगे।