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सुख-दुख दोनों एक ही सिक्के के पहलू

6 वर्ष पहले
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आनंदमार्गप्रचारक संघ द्वारा आनंदमार्ग स्कूल प्रभात काॅलोनी, चास में नीलकंठ दिवस मनाया गया। इस अवसर पर छह घंटे का बाबा नाम केवल अखंड कीर्तन का आयोजन किया गया। 12 फरवरी 1973 को आनंदमार्ग के संस्थापक गुरु श्रीश्री आनंदमूर्ति जी को पटना बांकीपुर सेंट्रल जेल में चिकित्सा के नाम पर दवा के रूप में जहर दिया गया था। इसका असर पूरे शरीर पर प्राकृतिक के अनुकूल पड़ा। श्रीश्री आनंदमूर्ति जी का पूरा शरीर सिकुड़ गया। आंखों की रौशनी चली गई। सिर के बाल झड़ गए। इसके बावजूद भी आनंदमूर्ति जी जीवित रहे। 12 फरवरी के दिन आनंदमार्गीय पूरे विश्व में नीलकंठ दिवस के रूप में मनाते हैं। इस ऐतिहासिक दिन के अवसर पर आनंदमार्ग आश्रम में गुरु के जीवन के विषय में चर्चा करते हुए श्याम सुन्दर जी ने कहा कि श्रीश्री आनंदमूर्ति जी ने विष का पान कर दुनिया को यह बतला दिया कि कितनी भी कड़ी से कड़ी मुसीबत आए उसका सामना हर नैतिकवान पुरुष को करना होगा। मुसीबत को उपहार के रूप में स्वीकार करना होगा। तभी मनुष्य अपने जीवन में बड़ा से बड़ा कार्य कर सकता है। सुख और दुख दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जहां सुख है वहां दुख भी है। केवल सुख रहने से ही जीवन का सही अनुभव कभी नहीं हो सकता है। दुख का आना भी मनुष्य के जीवन में जरूरी है। क्योंकि इससे मनुष्य को तथा आने वाले पीढ़ी को मुसीबत का सामना कैसे किया जाए सीखने का मौका मिलता है। इस अवसर पर आश्रम में लगभग 200 गरीब लोगों को भोजन कराया गया। मौके पर मनोज कुमार, शिवचरणजी बंधु, लालाजी, उमा देवी, मोहन, वार्ड पार्षद अर्चना आदि थे।