बोकारो | देश के मिसाइल मैन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने बोकारो जिले को तकनीकी रूप से दक्ष बनाने के लिए कई ड्रीम प्रोजेक्ट बनाया था। लेकिन अदूरदर्शी सरकारों के कारण डा. कलाम का सपना बोकारो जिले में दम तोड़ दिया। डा. कलाम ने बोकारो में साइंस सेंटर कम टेक्नोलॉजी लाइब्रेरी, साइंस म्यूजियम, टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी, मल्टी मीडिया कॉरिडोर सहित कई प्रोजेक्ट झारखंड सरकार को दिया था।
झारखंड गठन के बाद बनी पहली सरकार के बुलावे पर डा. कलाम बोकारो आए थे। उन्होंने उसी दौरान कई योजनाओं का शिलान्यास भी किया था और कई योजनाओं का प्रोजेक्ट झारखंड सरकार को दिया था। लेकिन डा. कलाम का सपना पूरा नहीं हुआ। अधूरा साइंस सेंटर अब कचरों में दबता जा रहा है, वहीं साइंस म्यूजियम खेल मैदान बन गया। महुआ से किसमिस बनाने का सपना अब सपना ही रह गया। मेडिशनल प्लांटेशन का नामोनिशान मिट गया। तकनीकी यूनिवर्सिटी और मल्टी मीडिया कॉरिडोर फाइलों में दब कर रह गई। ये योजनाएं धरातल पर नहीं उतरने से डा. कलाम के साथ उन बच्चों के सपनों पर भी पानी फिर गया, जो बड़े होकर डा. कलाम के नक्शे कदम पर चलकर वैज्ञानिक बनाना चाहते थे।
रूरल टेक्नोलॉजी पार्क था डा. कलाम का सपना: डॉ. कलाम ने रूरल टेक्नोलॉजी पार्क का सपना देखा था। डॉ. कलाम ने कहा था कि दक्षिण के उम्दा अंगूरों के अलावा झारखंड के महुआ से भी बेहतर किसमिस बन सकती है। यह अंगूर की किसमिस से ज्यादा पौष्टिक होगा। डा. कलाम के निर्देश पर विभाग ने यह पहल शुरू की थी। इस योजना पर यमुनालाल बजाज अवार्ड से सम्मानित एसआरआई के वैज्ञानिक डा. एके बसु ने वैदरिंग प्रोसेस से यह प्रमाणित किया था कि महुआ के किसमिस का स्वाद और पौष्टिकता अंगूर के किसमिस से कम नहीं है। वर्ष 2002 में तत्कालीन विभागीय मंत्री समरेश सिंह ने चंदनकियारी के बगुला में इसके प्रोसेसिंग प्लांट का शिलान्यास किया था। लेकिन इस योजना को भी अमली जामा नहीं पहनाया गया और डा. कलाम का यह सपना भी अधूरा रह गया।
तकनीकी विश्वविद्यालय का सपना रह गया अधूरा :
चंदनकियारी प्रखंड के खेदाडीह गांव में डा. कलाम ने एक अक्टूबर 2001 को साइंस म्यूजियम का शिलान्यास किया था। यह योजना झारखंड सरकार ने पायलट प्रोजेक्ट के तहत शुरू किया था। जितना चाहिए उतना मिलेगा की तर्ज पर इसके निर्माण को स्वीकृति दी गई थी।
बंदरबांट हो गई साइंस म्यूजियम की राशि
शुरूआती दौर में भवन निर्माण के लिए 54 लाख रुपये की स्वीकृति दी गई थी। इसमें सरकार ने बोकारो डीसी को 25 लाख रुपये भेज दिया था। डीसी ने भवन निर्माण के लिए निविदा निकालने का निर्देश दिया था। लेकिन विभागीय मंत्री इतने उतावले थे कि निविदा प्रक्रिया में देर होने की बात कहकर इस कार्य को विभागीय तौर पर कराने का प्रस्ताव भेज दिया और सरकार ने इसका निर्माण विभागीय कराने की अनुंशसा कर दी। फलस्वरूप इस योजना में स्थानीयस्तर पर कोई नियंत्रण नहीं रहा और समय ने करवट बदली, सरकार और मुख्यमंत्री बदलते रहे, किसी ने इस पायलट प्रोजेक्ट पर ध्यान नहीं दिया, हश्र यह हुआ कि डा. कलाम का यह सपना भी विभागीय अधिकारियों की भेंट चढ़ गया।
क्या थी योजना क्या होता लाभ : केंद्र सरकार के स्पेस सेंटर ऑफ इंडिया द्वारा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के तहत इसे तकनीकी सहायता देनी थी। इसमें विद्यार्थियों एवं दर्शकों को विज्ञान, तकनीकी तथ्य की जानकारी वैज्ञानिक तरीके से दी जानी थी। साथ ही वस्तुओं का विशलेषण वैज्ञानिक तरीके से करनी थी। इसमें तीन श्रेणी के उम्र वाले बच्चों को श्रेणी बद्ध करते हुए विज्ञान की जानकारी देने का कार्यक्रम था। प्रथम श्रेणी में कक्षा सात तक के विद्यार्थियों को फन एंड नालेज आदि की जानकारी, दूसरी श्रेणी में सूचनात्मक विज्ञान की जानकारी और तीसरी श्रेणी में चमत्कारिक विज्ञान- तकनीकी एवं अंतरिक्ष की संपूर्ण जानकारी देनी थी। इसके अलावा वयस्क लोगों के लिए विज्ञान तकनीकी से संबंधित पुस्तक उपलब्ध कराना था।
- साइंस सेंटर, साइंस म्यूजियम, तकनीकी यूनिवर्सिटी और मल्टी मीडिया कारीडोर सहित कई योजनाएं नहीं उतरी धरातल पर
मिसाइल मैन डा. कलाम ने झारखंड सरकार को मल्टी मीडिया कॉरिडोर की स्थापना का प्रस्ताव दिया था। सरकार ने इस महत्वपूर्ण योजना पर काम करने की सहमति भी दी थी। इसके लिए लगभग 44 हजार करोड़ का बजट बनाने का प्रस्ताव था। लेकिन बीच में ही सरकार हट गई और डा. कलाम का यह सपना भी अधूरा रह गया। बोकारो जिला समाहरणालय के समक्ष वर्ष 2002 में करीब डेढ़ करोड़ की लागत से साइंस सेंटर कम तकनीकी लाइब्रेरी का निर्माण शुरू हुआ था। यह डा. एपीजे अब्दुल कलाम के ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल था। यह योजना बच्चों को विज्ञान के क्षेत्र में उत्प्रेरित करने वाली थी। भवन निर्माण में एक करोड़ 24 लाख रुपये और अन्य सामग्रियों में लगभग तीन लाख रुपये खर्च करने की योजना थी। सरकार ने पहली किश्त के रूप में उपायुक्त को 65 लाख रुपये उपलब्ध करा दिए थे। लेकिन इसके बाद राजनीतिक उठापटक के कारण यह योजना अधर में लटक गई।
पूर्व राष्ट्रपति ने बोकारो को तकनीकी रूप से दक्ष करने का देखा था सपना : डॉ. कलाम ने झारखंड सरकार को बोकारो में तकनीकी विश्वविद्यालय खोलने की सलाह दी थी। डा. कलाम ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा खत्म होने के बाद तकनीकी शिक्षा में आई समस्याओं के कारण (एनडीए) नेशनल डिफेंस एकेडमी की परीक्षा देने की चर्चा झारखंड सरकार से की थी। डा. कलाम की बातों से प्रभावित होकर बोकारो में तकनीकी विवि की स्थापना पर सरकार ने रूचि दिखाई थी, लेकिन इसके लिए जमीन उपलब्ध नहीं करा पाई। बोकारो रेलवे स्टेशन के पास जमीन चिह्नित की गई थी। डा. कलाम ने उसका निरीक्षण भी किया था। लेकिन जमीन चिह्नित ही रही, सरकार इसे आवंटित नहीं करा पाई।
राष्ट्रपति बनने से पहले 2001 में डा. कलाम आए थे बोकारो
फाइलों में दब गई मल्टी मीडिया कॉरिडोर
कचरों के ढेर में दबता जा रहा साइंस सेंटर ।
(साइंस सेंटर कम टेक्नोलॉजी लाइब्रेरी के पास जमा कचरा।)