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बचपन की यादें रुला जाती हैं तनहाइयों में..

5 वर्ष पहले
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राणाप्रताप की धरती पर जयचंद गीत मत लिखने दो, मिर्ची लगती है तो लगने दो..., सुनो स्वदेशी जागरण मंच की पुकार, स्वदेशी वस्तु ही हो केवल स्वीकार.. सरीखी देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत कई कविताओं से बुधवार की शाम गुलजार रही। अवसर था सेक्टर-4 स्थित मजदूर मैदान में सात दिवसीय स्वदेशी मेला के समापन का। इस मौके पर नगर के कई प्रतिष्ठित कवि-कवयित्रियों ने अपनी प्रस्तुतियों से समां बांध दिया। गोष्ठी का आयोजन अखिल भारतीय साहित्य गोष्ठी के तत्वावधान में किया गया। अर्पिता सिन्हा की तन्हाई कविता की पंक्तियों बचपन की यादें रुला जाती हैं तनहाइयों में... ने लोगों की खूब वाहवाही बटोरी। देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत कविताओं के अलावा हास्य रस की कविताओं एवं अन्य कविताओं को श्रोताओं ने खूब सराहा। उषा झा की नेह रंग फीकी रही मेरी... वकील दीक्षित ने राशियों का वर्णन...कस्तूरी सिन्हा ने कौन कहता है ईमान नहीं है जिन्दा, आदमी की पहचान है अभी जिन्दा...उदयकांत सिंह ने खुद अपने ख्याल को सनम कहते थे...प्रफुल्ल चंद पाठक ने मेला के कोना में लिट्टी-चोखा के दुकान बा...रामनारायण उपाध्याय ने हंसो तो आसान है जिंदगी तथा डॉ. रंजना श्रीवास्तव ने गुड़ियों की तरह हमको रिझाती है बेटियां...कविता सुनाकर भरपूर वाहवाही बटोरी। इनके अतिरिक्त वासुदेव, अखिलेश अखिल, त्रिलोकीनाथ, कुमार आर्यन, दीपक, दीनानाथ एवं पवन ने भी अपनी-अपनी कविताओं से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।

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