बोकारो। इंगलैंड की डा. लिंडसे वर्न्स 1982 में चंदनकियारी आई थी रिसर्च करने। क्षेत्र में गरीबी और महिलाओं की दुर्दशा देख उनकी समस्याओं को सुलझाने की कोशिश की। एक समस्या सुलझाई, तो दूसरी सामने आई। सबसे ज्यादा समस्या गर्भवती महिलाआें की थी।
बेहतर चिकित्सा व्यवस्था नहीं। गरीबी के कारण गर्भवती महिलाओं और शिशुओं की मौत, कुपोषण सहित इतनी समस्याएं सामने आईं कि इन समस्याओं को दूर करते-करते लिंडसे अब चंदनकियारी की ही बनकर रह गई। अपने संघर्ष और मजबूत इच्छा शक्ति की बदौलत लिंडसे ने हजारों महिलाओं को स्वावलंबी बनाया।
वहीं एनजीओ के माध्यम से लोगों को चंदनकियारी के सुदूर गांव चमड़ाबाद में एक अस्पताल खोलकर न्यूनतम दर पर बेहतर चिकित्सा सुविधा देने लगी। बोकारो के कई जाने-माने चिकित्सक यहां मात्र 20 रुपए में मरीजों का इलाज करते हैं। लिंडसे मन में बिना किसी लालच के सेवा भावना से लोगों की सेवा कर रही हैं।
इंगलैंड की बेटी चमड़ाबाद में मिट्टी से बने खपरैल से बने घर में रहती हैं। 24 घंटे में किसी भी समय कोई उनके पास पहुंचे, पूरे जिंदादिली के साथ लोगों से मिलती हैं। लिंडसे की मुस्कुराहट और जिंदादिली देख ही लोगों की आधी समस्या और बीमारी दूर हो जाती है।
जन चेतना मंच स्वयंसेवी संस्था के माध्यम से दोनों पति-प|ी यहां के लोगों की सेवा कर रहे हैं। उच्च शिक्षाधारी यह दंपत्ति अगर पैसा कमाना, राजनीति करना या नौकरी करना चाहते, तो आसानी से कर सकते थे। निस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करना इनके जीवन का लक्ष्य बन चुका है। इनके एनजीओ के अधीन 500 से ज्यादा एसचजी ग्रुप हैं।
लगभग 10 हजार महिलाओं को जोड़कर स्वरोजगार से जोड़ते हुए लगातार मार्गदर्शन दे रहे हैं। युवतियों को हेल्थ ट्रेनिंग देकर नर्स बना रहे हैं। इनसे ट्रेनिंग लेकर सैकड़ों युवतियां चास और बोकारो के निजी अस्पतालों में नर्स का काम कर रही हैं। वे अस्पताल में न्यूनतम दर पर स्वास्थ्य सेवा हर माह देती हैं।
लिंडसे से जब उनकी शादी के बारे में पूछा गया कि उन्होंने लव मैरिज की या अरेंज मैरिज? उन्होंने तपाक से जवाब दिया, आफकोर्स लव मैरिज। हमारे देश में अरेंज मैरिज होता ही नहीं है। अपने बारे में बताते हुए लिंडसे कहती हैं, 1982 में जेएनयू दिल्ली में पढ़ाई करने आई थी। 1982 से 89 तक एमफिल और पीएचडी की।
उनके पीएचडी का रिसर्च कोलियरी और उसके मजूदर थे। रिसर्च करने झारिया आई, लेकिन वहां पुराने मजदूर नहीं मिले। पुराने मजदूर खोजती हुई, चंदनकियारी के गांवों में आई। पीएचडी भी की। उनके साथ जेएनयू में रंजन घोष एमए कर रहे थे। उन्होंने भी
कोलकाता विश्वविद्यालय से पीएचडी की। दोनों के रिसर्च का विषय मजदूर ही था।
दोनों ने चंदनकियारी में ही रिसर्च किया। दोनों में प्यार हुआ और 1985 में उन्होंने शादी कर ली। रंजन 1983 से ही चंदनकियारी में रहने लगे थे। वे गांव के लोगों की समस्याओं को रुचिपूर्ण तरीके से सुलझाते थे। लिंडसे भी बीच-बीच में उनसे मिलने आती थी। उसके बाद दोनों यहीं बस गए।
मरीजों से बात करतीं लिंडसे लिंडसे का मिट्टी का घर।
तोके काल डेकेछीली आज के आसछी?
दैनिक भास्कर के बातचीत के दौरान एक महिला लिंडसे से मिलने कमरे में आई। लिंडसे ने उसे देखते ही बांग्ला में कहा, तोके काल के डेकेछीली, आज के आसछी? लिंडसे द्वारा शुद्ध बांग्ला में महिला से बात करने पर जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ग्रामीण महिलाओं की समस्याएं जानने और उन्हें सुलझाने के लिए स्थानीय भाषा जानना जरूरी है।
इसलिए लिंंडसे जब यहां आईं तभी से स्थानीय भाषा सिखने लगीं। कुछ ही दिनों में लिंडसे स्थानीय भाषा सीख गईं। अब तो लिंडसे धड़ल्ले से हिंदी, बांग्ला और खोरठा बोलती हैं।
500 से ज्यादा एसएचजी ग्रुप बनाकर महिलाओं को बनाया स्वावलंबी
20 बेड का अस्पताल कर न्यूनतम सहायता राशि लेकर दे रही चिकित्सा सेवा
20 में उपलब्ध करा रही हैं ग्रामीणों को बोकारो के जाने-माने चिकित्सकों की सेवा
70 से 80 गर्भवती महिलाओं का अस्पताल में हो रहा है प्रसव हर माह।