षष्ठी को पंडालों में विराजेंगी मां
मांकूष्माण्डा की आराधना के साथ ही दुर्गोत्सव का रंग धीरे-धीरे जोर पकड़ने लगा है। रविवार को घरों और मंदिरों में मां कूष्माण्डा की पूरे विधि-विधान से पूजा की गई। दो दिन बाद से माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो जाएगा। इसी के साथ पंडालों में मां की प्रतिमा स्थापित करने का क्रम भी शुरू हो जाएगा। षष्ठी तिथि से मां पंडालों में विराजमान हो जाएगी। शहर के अधिकतर पंडालों में षष्ठी के दिन ही कलश स्थापना की जाती है। पंडित आशुतोष तिवारी के अनुसार जिन पंडालों में बांग्ला पद्घति से मां की पूजा होती है, वहां कलश स्थापना षष्ठी को ही होती है। उसके अगले दिन बेल वरण को पंडाल में लाया जाता है। बेल वरण के आने के बाद ही मां का पट श्रद्धालुओं के लिए खोला जाता है। चार दिवसीय दुर्गोत्सव का उत्साह सप्तमी तिथि से ही शुरू हो जाता है, जो विजयादशमी तक जारी रहता है।
बिजली के कारण परेशानी
पूजा समिति और मूर्तिकारों को इस बार बिजली संकट के कारण काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। संकट का यह क्रम अब भी जारी है। पंडाल और प्रतिमा निर्माण में जुटे कारीगरों ने बताया कि इस बार बिजली संकट के कारण केवल काम प्रभावित हुआ है, बल्कि लागत भी बढ़ गई है। दुर्गोत्सव को लेकर बंगाल और झारखंड में काफी अंतर रहता है। बंगाल में जहां दुर्गोत्सव की तैयारी दो-तीन माह पहले ही शुरू हो जाती है, लेकिन झारखंड की यह पूजा मात्र एक माह की होती है। एक महीना के अंदर ही पूजा समिति गठित की जाती है और प्रतिमा का ऑर्डर दिया जाता है। मूर्तिकारों के पास 20 दिन का ही समय होता है। रात-दिन काम कर षष्ठी से पहले तक प्रतिमा को अंतिम रूप देने की चुनौती रहती है। पूर्व में बिजली के कारण इतनी परेशानी नहीं थी। इस बार अधिकतर काम जेनरेटर में करना पड़ा है।
बंगाल भी जाती हैं प्रतिमाएं
^धनबादमें निर्मित प्रतिमाएं बंगाल के आसनसोल भी जाती हैं। इसके अलावा कोडरमा, कतरास, सिंदरी और भूली भी जाती हैं। महंगाई का असर इस कारोबार पर भी पड़ा है। ^दुलाल पाल,मूर्तिकार।
मां की प्रतिमा को अंतिम रूप देने की तैयारी
धनबाद|पूजा मेंअब केवल दो दिन रह गया है। षष्ठी से पूजा की धूम नजर आने लगेगी। पूजा नजदीक आते देख पंडाल और प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का काम भी तेज हो गया है। पंडाल बनाने वाले कारीगर जहां दिन-रात लगे हुए हैं, वहीं मूर्तिकार भी अब मां का श्रृंगार का काम पूरा कर