वर्षों से हार रहे हैं ये मुद्दे
मुद्दे सिर्फ वोट दिलाते हैं, चुनाव बाद हार जाते हैं
मुद्देहैं, मुद्दों का क्या? मुद्दे... नेता के बोल-वचन। मुद्दे... नेताओं की कसमें -वादे। मुद्दे...जिन पर नेता मांग सकें वोट। राजनीति में मुद्दों को समाप्त नहीं किया जाता, बल्कि उन्हें जिंदा रखा जाता है। मुद्दों को विकराल बनाकर उन पर चुनाव लड़े जाते हैं। चुनाव में जीत किसी भी पार्टी और किसी भी नेता की हो, हारा हमेशा मुद्दा ही। पानी, बिजली और सड़क हर चुनाव में मुद्दे बने, पर इससे हुआ क्या? क्या पानी घर-घर पहुंच गया, क्या बिजली पर्याप्त मिलने लगी और क्या सड़कों का जाल बिछ गया? नहीं..., ये तीनों समस्याएं बरकरार हैं। नेताओं के वादे हर बार झूठे निकले। हर विधानसभा क्षेत्र में कुछ ऐसे ही मुद्दों पर वर्षों से चुनाव की राजनीति होती रही है। नेता सब्जबाग दिखाकर वोट लेते रहे हैं।
विवरण : कोयलाऔर इस पर रंगदारों की गिद्ध नजर। कोलियरी क्षेत्रों में कब्जे की जंग में गोली भी चली और बमबाजी भी हुई। रंगदारी के माहौल से जनता को घुटन महसूस हुई। नेताओं ने इसे चुनावी मुद्दा बना दिया। हर बार माफिया हटाओ के नारे लगाए गए। रंगदारी मुक्त समाज के नाम पर वोट मांगे गए। पर स्थिति बिल्कुल नहीं बदली। रंगदारी से हर तबका परेशान है।
विवरण : जमीनके नीचे आग। इस भूमिगत आग से विस्थापन की समस्या उत्पन्न हुई। लोगों की इस समस्या को नेताओं ने अपना चुनावी मुद्दा बनाया। हर बार इस मुद्दे के साथ जनता के बीच गए। बड़े-बड़े वादे किए। बेहाल जनता को नए सपने दिखाए। पर हुआ आज तक कुछ नहीं। तो झरिया की आग कम हुई और ही लोगों की इच्छा के अनुसार पुनर्वास हुआ। वोट आज भी आग के नाम पर मांगे जा रहे हैं।
विवरण : निरसाके कई हिस्से कोयला तस्करों के लिए चरागाह बन गए। अवैध खनन में कई जानें गईं। गरीबों की मौत पर नेताओं ने भाषण दिए। चुनाव आया, तो मुद्दा बनाया। तस्करों को भगाने से लेकर अवैध खनन को वैध बनाने तक का वादा किया। पर हुआ कुछ नहीं। वर्षों से तस्कर यहां राज कर रहे हैं।
विवरण : उग्रवादसमाप्त करेंगे, विकास होगा और पलायन रुकेगा। नेताओं के ऐसे बोल 20 वर्षों से यहां गूंज रहे हैं। चुनाव आते ही नेताओं को उग्रवाद और पलायन की चिंता सताने लगती है। नेता इनके नाम पर वोट मांगते हैं। चुनाव समाप्त, तो मुद्दा भी समाप्त। यहां से उग्रवाद समाप्त करने की पहल हुई और ही पलायन रोकने की कोशिश।