काले हीरे से नेताओं ने काटी चांदी
जातीय समीकरण
झरिया में त्रिकोणीय मुकाबले के आसार
कालेहीरे के ऊपर बसा है झरिया। यहां के कोयले से पूरा देश रोशन होता है। कोयले की कमाई से केंद्र लाल है, तो रॉयल्टी से राज्य का भी खजाना भर रहा है। इसके बावजूद झरिया ऐसी समस्याओं से जूझ रहा है, जिनका निदान संभव है, परंतु उस दिशा में कभी गंभीरता नहीं बरती गई। झरिया के नाम पर नेताओं की नेतागीरी खूब चमकती है। अधिकारियों की जेब भी खूब भरती है। इसके बावजूद जान हथेली पर रख खदानों में उतर जो खनिक कोयला काटते हैं, उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। उनकी जीवनशैली आज भी जस की तस है। कोयले पर ही आधारित उद्योग और कारोबारों पर भी आफत है। झरिया की एक बड़ी आबादी को नोटिस थमा सुरक्षित स्थान में जाने को कहा जा चुका है। उन्हें कहा जा रहा है कि भूधंसान क्षेत्रों में उनके मकान-दुकान हैं। समेट लो, वरना कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। इन लोगों को बसाने के लिए करोड़ों खर्च कर कोसों दूर बेलगड़िया जैसे बियावान स्थान पर ऐसे आवास बना दिए गए, जहां शाम ढलने के बाद कोई जाना नहीं चाहता। विस्थापन एक ऐसा दंश बन गया, जिसका निदान निकालने को लेकर शासन-प्रशासन से लेकर नेताओं ने कभी गंभीर दिलचस्पी नहीं दिखाई। पेयजल संकट तो इस क्षेत्र की स्थायी पहचान है ही। पानी के लिए एक बड़ी आबादी पौ फटते ही जुगाड़ में निकल पड़ती है। प्रदूषण की भी मार ऐसी है कि सड़कों को छोड़िए, घरों में भी हर रोज कोयले की राख की मोटी परत जम जाती है।