यह तो दादाओं का ही शहर है
गिरोहबाजों कायह शहर है। जिनके गिरोह हैं वही कोयलांचल का सिरमौर है। यह मुहल्ले से शुरू होकर कोलियरियों तक फैल गया है। यहां ईमानदारी की संस्कृति नहीं। लूट लो। यही यहां का मूल मंत्र है। पहले बाहर से आकर लोगों ने झारखंड को लूटा। कोलियरियों को लूटा। यहां की सरकारी जमीन लूटी। यहां की नौकरी लूटी। अभी लूट और बढ़ गई है। चीट फंड कंपनियों और नन बैंकिंग के नाम पर अरबों रुपए की लूट कोयलांचल में अभी हाल में मची। इसमें स्थानीय-बाहरी सब शामिल हैं। लोगों ने सरकारी योजनाएं लूट ली है। इस लूट की संस्कृति वाले शहर में कोई लूट को गलत समझने वाला जाए तो उनकी क्या नौबत होगी। ऐसे बहुत से लोगों की बुरी नौबत लोगों ने देखी। ऑडिटर एसएस दास की याद दहला जाती है। दास ने लूट में शामिल होने से इनकार कर दिया। नतीजा उन्हें जिंदगी ने भी इनकार कर दिया। ऐसे ढेर सारे उदाहरण हैं। जब लूट से इनकार करने वाले धनबाद के मुखर लोगों की दुर्भावना के शिकार हुए। अब कुछ जगह पर लूटने के खिलाफ कुछ विरोध नमूदार हुए हैं। यह बताता है कि लूट के खिलाफ विरोध लगातार चलता रहेगा। चाहे कोई हत्या की धमकी ही क्यों दे दे। {खबरची
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