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व्यवस्था की बहाली बहुत कठिन है

5 वर्ष पहले
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सिर्फ फुटपाथदुकानें हटा देने और सड़कें चौड़ी कर देने से सब कुछ ठीक नहीं होने वाला। दरअसल सालों से बिगड़ी व्यवस्था और बिगड़ती ही गई है। अब लोग उस दौर में चुके हैं जब व्यवस्था में सुधार की बातें लतीफे की तरह हो गई है। लोग हंसते हैं। इसलिए अफसर अब सोच समझ कर ही कुछ बोलते हैं। उन्हें नहीं लगता कि उनके जिम्मेवार समाज में कोई सुधार लाने का काम सौंपा गया है। वह तो सोचते हैं कि आज की नौकरी कट गई, कल कट जाएगी। परसों...। वे क्यों इस व्यवस्था को हिलाने और उसे ठीक ठाक पर जगह पर फिट करने में रूचि लें। ...भइया नौकरी कर रहे हैं। ऐसी ही सभी की भाषा हो गई है। इसका मतलब यह है कि वे वह नहीं करेंगे जो होना चाहिए। बल्कि वे तो वही करेंगे जो होता आया है। होता यह आया है कि कमीशन का सरकारी काम में परसेंटेज बढ़ गया है। लोगों को थोड़े भ्रष्टाचार में पोसाई नहीं पड़ रही। ये दिल मांगे मोर। नतीजा कि व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं। कहने को कितने फार्म, अप्लीकेशन, सिस्टम पर कोई सिस्टर लोगों को भरोसा देनेवाला नहीं। ऐसे में लोगों को इसका भरोसा नहीं कि फुटपाथों से जिनको उजाड़ा जाएगा, उन्हें जगह मिलेगी। उनके साथ न्याय होगा। धनबाद के लोगों को याद नहीं उनके साथ कब न्याय हुआ। फिर अब न्याय कैसे होगा। फुटपाथ दुकानदारों की सुविधा कोई और गटक जाएं इसकी गारंटी नहीं है। {खबरची

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