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सदफ नाज . धनबाद

7 वर्ष पहले
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सदफ नाज . धनबाद

भारतविविधताओं का देश है। यहां हर क्षेत्र में बोली और संस्कृति बदल जाती है। एक ही त्योहार अलग-अलग कम्यूनिटी में अलग-अलग रूप ले लेता है। आजकल हर तरफ लोग आदि शक्ति मां दुर्गा की अराधना में लीन है। हर एक कम्यूनिटी अपने ढंग से इस त्योहार को मना रहा है। जहां गुजराती अपने पारंपरिक रूप से त्योहार को सेलीब्रेट कर रहे हैं, वहीं बंगाली समुदाय भी अपने तरीके से दुर्गा पूजा का उत्सव मना रहा है। शहर का बिहारी समुदाय भी पारंपरिक तरीके से दुर्गा पूजा मनाता है। आमतौर पर बिहारी परिवार घर पर कलश स्थापना कर मां की अराधना करता है। पितृपक्ष खत्म होते ही दुर्गा पूजा के साथ त्योहारों का सिलसिला शुरू होता है, जो छठ तक चलता है। इसलिए इस त्योहार का उत्साह अलग ही होता है।

लोगों से मिलने-जुलने और खरीदारी का समय

दुर्गा पूजा सिर्फ आध्यात्मिक सुख देता है, बल्कि इसके पूरे वर्ष इंतजार का एक और कारण है कि इस दौरान लोगों से मिलना-जुलना और ढेर सारी खरीदारी होती है। बच्चे, बड़े, महिलाएं सब नए कपड़े, एक्सेसरीज और इंटीरियर डेकोर के समान की खरीदारी करते हैं। घरों की साफ सफाई होती है और सब कुछ नया होता है। घर के सदस्यों के नए कपड़े अष्टमी को पूजा के बाद कलश के सामने रखे जाते हैं। इसके बाद ही घर के सदस्यों को नए कपड़े पहनने की अनुमति होती है।

नियम का रखते हैं ख्याल

पूजा के दौरान नियम का काफी ख्याल रखा जाता है। शुद्ध भोजन करते हैं। खाने में सेंधा नमक का ही इस्तेमाल किया जाता है। अरवा चावल, चने की दाल, हरी सब्जियों का सेवन होता है। मीट-मछली और लहसुन-प्याज से परहेज किया जाता है। कलश स्थापना के साथ ही शुद्धता का खास ख्याल रखा जाता है। सुबह उठकर पूजा घर में सफाई की जाती है। वहां झाड़ू नहीं लगाई जाती है, बल्कि कपड़े से सफाई की जाती है। हर दिन के बेल-पत्र और फूलों को भी फेंका नहीं जाता है। हर दिन पूजा घर में जमा कर रखा जाता है। विसर्जन के दिन कलश के साथ इन्हें भी विसर्जित किया जाता है।

कलश को देवी का प्रतीक मान कर स्थापित किया जाता है। हर कोई अपने मन के अनुसार पीतल, कांसा या मिट्टी का कलश स्थापित करता है। मिट्टी के कलश को पारंपरिक रूप से शुद्ध माना जाता है। हर दिन कलश के सामने दुर्गा पाठ होता है। अष्टमी के दिन पूजा करते हैं, नौंवी के दिन कन्या जिमाया जाता है। दसवें दिन कलश विसर्जन होता ह