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अंग्रेजों ने कराया था निर्माण, तालाब का अतिक्रमण होने लगा, 18 एकड़ में फैला हुआ है ऐतिहासिक तालाब

4 वर्ष पहले
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पर्यटन विभाग से जीर्णोद्धार की मांग

अजयकुमार तिवारी }धनबाद 728090990

गोविंदपुरका ऐतिहासिक रेजलीबांध तालाब कभी गोविंदपुर के लिए शान हुआ करता था। लेकिन स्थानीय लोगों द्वारा लगातार कचरा फेंके जाने तथा प्रशासन द्वारा तालाब की देख-रेख समय-समय पर नहीं कराए जाने से तालाब पूरी तरह से भर चुका है और अब वह किसी काम के लायक नहीं रह गया है। तालाब में हर ओर जलकुंभी भरी पड़ी है और किनारे में कचरे इतने दुर्गंध देते है कि उसके बगल से गुजरना भी मुश्किल हो गया है। जबकि इस तालाब के माध्यम से सरकार चाहे तो आधे गोविंदपुर में जलापूर्ति कर सकती है। लेकिन जिला परिषद ने इसके जीर्णोद्धार से जहां अपना हाथ खड़ा कर दिया है वहीं अब स्थानीय लोगों एवं जनप्रतिनिधियों के पहल पर सरकार से मांग की गई है कि इसे पर्यटन विभाग के माध्यम से जीर्णोद्धार कराया जाए। लेकिन मामला अबतक सरकार के ही पाले में है जीर्णोद्धार को लेकर कोई पहल नहीं हो पा रही है। इससे यहां के लोगों में रोष व्याप्त होते जा रही है जो कभी भी आक्रोश का रूप धारण कर सकती है।

दुर्गंध इतना की पैदल गुजरना भी मुश्किल

तालाबके किनारे स्थानीय लोग अपने-अपने घरों या दुकान की गंदे कचरों को फेंक दिया है जिसकी सफाई नहीं होने से इन कचरों से इतनी ज्यादा बदबू रही है कि वहां से पैदल गुजरना भी मुश्किल हो जाता है। लोग वहां से गुजरते है तो अपने नाकों पर कपड़े डालकर गुजरते है। तालाब की सफाई नहीं कराई गई तो यहां महामारी भी फैल सकती है।

स्थानीय लोगों ने कहा कि यहां की गंदगी को लेकर बार संबंधित विभाग को पत्र लिखा गयाऔर स्वयं जाकर शिकायत की गई लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। पता नहीं सरकार और स्थानीय प्रशासन यहां की इस भीषण समस्या पर गंभीर क्यों नहीं है।

तालाब के पास ही धनबाद केमिकल फैक्ट्री थी इस फैक्ट्री से निकलने वाला कचरा इस तालाब में ही जाकर गिरता था। जिससे तालाब का पानी दूषित होने लगा और कुछ वर्षों के बाद ऐसा हुआ कि इसका पानी पीने ही नहीं अन्य कामों के लायक भी नहीं रहा। स्थानीय लोगों ने भी इस तालाब को दूषित करने में कम योगदान नहीं दिया है।

तालाब का होने लगा अतिक्रमण

तालाबके भर जाने के बाद लोगों की नजर इसकी जमीन पर पड़ने लगी और धीरे-धीरे उसका अतिक्रमण करने लगे। पहले कचरों से तालाब के किनारे की जमीन को भरने लगे उसके बाद उस पर कुछ ना कुछ निर्माण कर उसका कब्जा करने लगे। आज भी इसका कब्जा हो रहा है जिसे देखने वाला कोई नहीं है।

जिला परिषद ने जीर्णोद्धार से खड़े किए हाथ

जिलापरिषद के द्वारा इस तालाब का निरीक्षण किया गया लेकिन यहां की भयावह स्थिति को देखकर तथा जीर्णोद्धार में भारी खर्च को देखते हुए जिला परिषद ने अपने हाथ खड़े कर दिए। जिसके बाद जिप अध्यक्ष रोबिन गोराई, उपाध्यक्ष हसीना खातून ने जिला परिषद के इंजीनियरों के साथ तालाब का निरीक्षण किया था लेकिन यहां की खर्च देखते हुए जिप के अधिकारियों ने अपने हाथ खड़े कर दिए। इधर नागरिक विकास मंच के शरद दुदानी ने सरकार को पत्र लिखकर मांग किया है कि इस तालाब का जीर्णोद्धार पर्यटन विभाग के माध्यम से कराने की मांग की है। श्री दुदानी कहते है कि जहां तक जिला परिषद से एनओसी की बात है तो सरकार पहले तय करे की पर्यटन विभाग से इसका जीर्णोद्धार करा दिया जाएगा तो हमलोग एनओसी भी ले लेंगे।

क्या है इतिहास रेजलीबांध का

वर्ष1882-83 की बात है उस वक्त गोविंदपुर में जबर्दस्त अकाल पड़ा था। तब तत्कालीन अनुमंडलाधिकारी मिस्टर रिस्ले की सिफारिश पर ही सरकार ने इस तालाब के निर्माण की अनुमति दी थी और करीब 18 एकड़ में इस विशाल तालाब का निर्माण कराया गया। पहले इस तालाब को रिस्ले बांध ही कहा जाता था। लेकिन बाद में इसका अपभ्रंश बनकर इसे रेजलीबांध कहा जाने लगा जो आजतक रेजलीबांध के नाम से ही जाना जा रहा है। उस वक्त इस तालाब के बीचोंबीच एक टापू हुआ करता था जिसे मिथिलेश द्वीप भी कहा जाता था। यहां रेस्ट हाउस, पार्क इत्यादि थे और अंग्रेज अधिकारी अपना समय व्यतीत करने के लिए यहां प्राय: आते रहते थे। स्थानीय लोग बताते है कि उस वक्त इस तालाब में नौका विहार तक हुआ करती थी। जिससे इस तालाब की गरिमा काफी बढ़ गई थी। तालाब से काफी लंबे समय तक जलापूर्ति भी होती थी लेकिन आजादी के बाद से इस तालाब का देख-रेख धीरे-धीरे बंद होने लगा। जिससे तालाब की स्थिति दिन प्रतिदिन खराब हो गई और नतीजा यह हुआ कि तालाब आज पूरी तरह से जलकुंभी और कचरा से भरकर बर्बाद हो चुका है।

तालाब से निकलती दुर्गंध की वजह से नाक बंद कर जाती महिला।

रेजलीबांध तालाब कभी गोविंदपुर की शान था, आज लोगों ने उसे कचरे से भर डाला

कचरों से भरा रेजली बांध तालाब। फोटो : अमित कुमार

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