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मुरझाए फूल और टूटे हुए झूले, ऐसा तो नहीं था करकेंद में हमारा नेहरू उद्यान

6 वर्ष पहले
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धनबाद। न वह फूल और न ही वह फूलों की खुशबू। वह बच्चों की चहक और ही बात-बात में लगने वाले लोगों के वह ठहाके। 90 की दशक में ग्रीन धनबाद का सपना दिखाने वाला करकेंद का नेहरू उद्यान देखते-देखते वीरान हो गया। पार्क से हरियाली रूठ गई है। फूल मुरझा गए और हरे पेड़-पौधे सूख कर बिखर गए। बच्चों को गोद में झुलाकर हंसाने वाले झूले टूट गए।
देखभाल के अभाव में नेहरू उद्यान बदरंग हो गया। अब इस पार्क में बच्चे भाग दौड़ मचाते हैं और ही यहां कोई सुबह-सुबह टहलने आता है। 50 हजार की आबादी का इकलौता पार्क अपनी बेहाली पर आंसू बहा रहा है। एनएच 32 पर करकेंद के समीप स्थित इस पार्क की जरूरत आज हर कोई महसूस कर रहा है।
लोग इस पार्क को पुन: जीवित करने की मांग कर रहे हैं। कुछ इसे लेकर आगे आने को भी तैयार हैं। संयुक्त प्रयास की एक पहल मात्र से इस पार्क के हरियाली भरे दिन लौट सकते हैं। जरूरत है, बस एक कदम बढ़ने की...।

एनओसी का पेंच | नगरनिगम ने इसके सौदर्यीकरण और जीर्णोद्घार के लिए एक करोड़ रुपए निर्धारित किए थे। टेंडर की प्रक्रिया शुरू होने वाली थी, तभी बीसीसीएल ने सौदर्यीकरण कार्य के लिए एनओसी देने से इंकार कर दिया।

पार्क से तालाब गुम | पार्क के समीप ही तत्कालीन सांसद प्रो. रीता वर्मा और विधायक रहे पीएन सिंह के मद से सामुदायिक भवन और एक तलाब का निर्माण कराया गया है। भवन तो आज भी है, लेकिन तालाब गुम हो गया।

करकेंद लायंस क्लब ने की थी पहले देखभाल

तत्कालीन डीसी व्यास जी के तबादले के बाद लायंस क्लब ऑफ करकेंद ने पार्क की देखभाल की जिम्मेवारी ली। क्लब के प्रयास से पार्क का विकास हुआ। लगातार आठ दिनों तक यहां मेला लगने लगा था। लोगों ने यहां आनंद का हर रंग देखा। धीरे-धीरे पदाधिकारियों की रूचि पार्क के प्रति कम होती गई। ऐसी स्थिति में पर्यावरण विकास समिति ने इसे अपने अधीन ले लिया। वर्ष 2000 के बाद इस कमेटी का भी पार्क की देखरेख से मोह भंग हो गया।

इकलौता पार्क : केन्दुआ,करकेंद, पुटकी, गोपालीचक, कच्छी बलिहारी समेत आसपास के क्षेत्रों का यह एक इकलौता पार्क है। इन इलाकों की कुल आबादी करीब पचास हजार के करीब है। इस क्षेत्र में दूसरा कोई पार्क नहीं है।

प्रदूषित क्षेत्र : इस इलाके में एक नहीं दर्जनों कोयला खदानें हैं। सड़कों पर कोयला लगे ट्रकों के आवागमन गमन से पूरा क्षेत्र प्रदूषित हो चुका है। स्वच्छ वातावरण की तलाश में ही लोग पार्क आते हैं।

टहलने का संकट : कोलियरी क्षेत्र होने के कारण लोग सड़क पर टहल भी नहीं पाते है। यह पार्क ही लोगों के मॉर्निंग वाक और मनोरंजन का एक मात्र साधन है। अब यह भी बंद हो गया है।

मुहल्ले में कैद बच्चे : पार्क की विरानी ने इलाके के बच्चों को मुहल्लों में ही कैद कर रख दिया है। वह पार्क तो आना चाहते हैं, पर टूटे झूले और बदरंग पार्क उन्हें यहां आने से रोकता है।

ऐसे बना था पार्क

90के दशक में धनबाद के तत्कालीन उपायुक्त रहे व्यासजी ने “आवर ड्रीम धनबाद ग्रीन’ अभियान के तहत इस उद्यान की नींव रखी थी। जमीन की व्यवस्था उन्हीं के प्रयास से बीसीसीएल ने की थी। अभियान के तहत यहां वृक्षारोपण किया गया। लोगों के बैठने के लिए सीमेंट की कुर्सी का निर्माण करवाया गया।
सैकड़ों की संख्या में पेड़-पौधे लगाए गए। देखते ही देखते पार्क रंग-बिरंगे फूलों से भर गया। फूलों की खुशबू मन मोहने लगी। हरियाली के बीच झूले लगाए गए। बच्चों की यहां मौज-मस्ती शुरू हो गई। सुबह से शाम तक यहां लोगों की भीड़ लगी रहती थी।

1. निगम करें पहल- नेहरू उद्यान की रौनक नगर निगम चाहे तो फिर से लौट सकती है। प्रयास किया जाए तो बीसीसीएल एनओसी देने के लिए राजी हो सकता है। 13 वें वित्त आयोग से मिले फंड में एक करोड़ रुपया इस पार्क के जीर्णोद्घार के लिए रखा गया था। यह फंड अभी भी निगम के पास है।

2. बीसीसीएल करें निर्माण- इस पार्क का सौदर्यीकरण बीसीसीएल अपने सीएसआर प्रोग्राम के तहत करा सकता है। जमीन उसकी है और उसी क्षेत्र में ही कंपनी की कई कोयला खदानें और कार्यालय है। पार्क के आसपास काफी संख्या में बीसीसीएल कर्मचारी ही रहते हंै। उनके बच्चे भी इसी पार्क में आते हैं।

3. सांसद,विधायकमद से भी हो सकता है काम- इस पार्क में सामुदायिक भवन और तालाब का निर्माण पहले भी सांसद और विधायक फंड से किया जा चुका है। इस बार भी अगर दोनों पहल करें और जीर्णोद्घार के लिए फंड उपलब्ध कराए तो इस पार्क का काया कल्प हो सकता है।

4. बड़ी कंपनियां कर सकती हैं मदद- धनबाद में एक नहीं दर्जनों ऐसी बड़ी कंपनियां हंै जो चाहंे तो इस पार्क की तस्वीर फिर से बदल सकती है। कई आउटसोर्सिंग कंपनी है जो कोयला खनन का काम कर रही है। अगर तीन चार कंपनियों ने संयुक्त रूप से भी पहल की तो पार्क फिर से गुलजार हो जाएगा। किसी पर अधिक आर्थिक बोझ भी नहीं पड़ेगा।