गांव की बहू : सरकारी टीचर
गांव की बहू : सरकारी टीचर
झारखंडके एक गांव में/नई-नवेली बहू/पारा टीचर बन गई है/सरकारी नौकरी लग गई है/धीरे-धीरे सरकारी दांव-पेंच भी वह सीख गई है/खाना खाने भी जाती है, तो/श्याम-पट्ट पर लिख देती है/शौचालय जा रही हूं/ताकि कोई सरकारी नुमाइंदा/निरीक्षण में अनुपस्थित जानकर हाजिरी काट दे/अभी उसे खिचड़ी भी चखना है/वोटर कार्ड के लिए आवेदन भी लेने हैं/वह आदमी से जानवर तक की गिनती जानती है/अफसोस, उसे पढ़ाने का वक्त नहीं मिलता।
गुलामगौस ‘आसवी’, मदनाडीह, धनबाद से...