पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

वे दिन

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
वे लोग

वे प्रकाश का तबादला धनबाद हो गया और उनके जीवन के साथ बंधी रमणिका के जीवन में सामाजिक और राजनीतिक तूफान का जो सिलसिला शुरू हुआ उसने उनके पूरे व्यक्तित्व को मथ कर रख दिया। मात्र गृहिणी बनकर रहना उन्हें पसंद नहीं था। तो बच्चों के लिए बालबाड़ी शुरू की, महिलाओं के लिए स्वयं सहायता समूह बनाकर उनके लिए रोजगार सृजन किया। इस बीच वेद प्रकाश का फिर तबादला हो गया। पर वह कानपुर नहीं गईं। 1962 से 1967 तक कांग्रेस में सक्रिय रहीं। कांग्रेस की राजनीति रास नहीं आई तो इस्तीफा दे दिया। अपने इस्तीफे में उन्होंने लिखा- मैं अपना रास्ता खुद बनाने में सक्षम हूं, अपना रास्ता खोज लूंगी या फिर रास्ता ही मुझे खोज लेगा। वह सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हुईं। फिर कच्छ आंदोलन से जुड़ीं। इस आंदोलन से रमणिका के स्वाभाविक बहिर्मुखी व्यक्तित्व ने उन्हें अपने परिवार से अलग करना शुरू किया। राजनीतिक मित्रों से घनिष्टता बढ़ती गई। ये संबंध शक-शुबहा की गलियों से गुजरते हुए तलाक की सीमा तक पहुंच गए। मांडू के चुनाव में रात को घर या दफ्तर नहीं जाती। सड़क किनारे चटाई बिछाकर सो जाती। फिर भी वह चुनाव नहीं जीत पाईं। संघर्ष जारी रहा। मजदूर यूनियन बनाई और घाटो, गिद्दी में टाटा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। लेकिन पार्टी ने टाटा से जब सौदेबाजी करनी शुरू की तो रमणिका ने पार्टी ही छोड़ दी। रमणिका फिर कांग्रेस में चली गईं और तत्कालीन मुख्यमंत्री केदार पांडेय ने उन्हें विधान परिषद का सदस्य बना दिया। इसी दौर में उनकी भेंट तत्कालीन गृहमंत्री उमाशंकर दीक्षित की बहू शीला दीक्षित से हुई। उनकी सिफारिश पर इन्हें रामगढ़ से 1971 में चुनाव लड़ने के लिए टिकट भी मिल गया, पर इन्हें चुनाव मैदान से हटना पड़ा। 1977 में उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ बगावत की। माकपा में जाना चाहा, संभव नहीं हुआ तो लोकदल में शामिल हुईं। 1980 का चुनाव लोकदल के टिकट पर मांडू से जीती। इस जीत में इनकी इकलौती गाड़ी बिक गई। जीत दिलानेवालों के असली चेहरे जब सामने आए तो उन्होंने राजनीति को ही अलविदा कह दिया। आखिर कब तक कितनी नावों में कितनी बार सवार होतीं? (जारी)

हार कर भी अपराजित रहीं रमणिका गुप्ता

चंद्रेश्वर

वरिष्ठपत्रकार, लेखक