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  • {रवींद्र पांडेय

{रवींद्र पांडेय

7 वर्ष पहले
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{रवींद्र पांडेय

तीनफेज खतम। आधा टेंशन हजम। राजधानी खाली। बड़के नेता धनबाद-संथाल की ओर उड़ लिए। अब उधरे भाषण-उषण देंगे। छोटेके नेता सचमुच के रोड पर गए। पार्ट टाइम नौकरी गई। फुल टाइम बेकारी गर्दन पर सवार है। समझ में नहीं रहा कि क्या करें, क्या नहीं करें। खाली कनस्तर जइसा जने-तने ढनमनाते फिर रहे हैं। उधर, वज्रगृह में अलग किचकिच मची है। हजारों ईवीएम की सांसें फुल रही हैं। खिड़की तो खिड़की, वेंटिलेटर को भी पैक कर रखा है। कुछ ईवीएम कूढ़ रही हैं। जनता को ख्याली पुलाव खिलानेवाले नेताओं को तो फ्री कर दिया। हमारे ऊपर पहरा बिठा रखा है। हमारे पास तो मिर्ची पाउडर भी नहीं कि सिपाही जी की आंख में झोंककर भाग जाएंगे। और भागेंगे भी तो क्या लेकर... नेताओं की किस्मत?... इन किस्मतों ने ही तो हमें परेशान कर रखा है।... अजीब-अजीब किस्मत से पाला पड़ा है। ईवीएम के अंदर भी चैन नहीं। बौद्धिक युद्ध जारी है। सबका अपना-अपना गणित है। जातीय समीकरण है। बूथ मैनेजमेंट पर भरोसा है। कोई कहता है, वोट कम पड़ा तो क्या हुआ, हमारे साथ ठुल्लू बाबा का आशीर्वाद है। नई बंडी पहनकर विधानसभा में हमही शपथ लेंगे। दूसरा टोकता है, कवनो बाबा-उबा का आशीर्वाद काम नहीं आएगा। पचास गो बूथ पर हमारे लोगों का कब्जा था। उनका पुरुषार्थ हमें जिताएगा। अबकी शपथ लेने की बारी हमारी है। इधर, प्रोफेसर साहब की किस्मत के चेहरे पर भी विजयी मुस्कान है। जिसे जितना फेंकना हो फेंक लो। समेटने का काम तो इस बार हम ही करेंगे। जनता जाग गई है। उसने अपना वोट बर्बाद नहीं किया होगा। जरूर उसने पढ़े-लिखे और स्वच्छ छवि वाले नेता का बटन दबाया होगा।

कैद में है किस्मत