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सारंडा में बढ़ सकती हैं नक्सली गतिविधियां
सारंडाजंगल का इलाका फिर खतरे में है। झारखंड बनने के महज दो साल बाद भाकपा माओवादी ने सारंडा को मुक्त क्षेत्र घोषित किया था। तीन साल पहले सारंडा को नक्सलियों के कब्जे से मुक्त कराया गया था। लंबी अवधि तक शांत रहने के बाद भाकपा माओवादी ने बड़े क्षेत्र पर फिर काबिज होने के लिए ऑपरेशन शुरू कर दिया है। इसका नतीजा है चाईबासा जेल ब्रेक।
चाईबासा में जेल ब्रेक के बाद मंगलवार की रात आठ हार्डकोर माओवादी टोंटो के रास्ते सारंडा जंगल में प्रवेश कर गए हैं। बिटकिलसोय और बालिबा कांड के बाद सारंडा जंगल में नक्सलियों का जोर बढ़ने लगा था। 2006 के बाद पांच साल तक सारंडा जंगल के भीतर प्रवेश करने से खाकी वर्दीधारी कांपते थे। महज तीन साल पहले तत्कालीन डीआईजी नवीन कुमार सिंह के नेतृत्व में ऑपरेशन एनाकोंडा और एनाकोंडा रिटर्न चलाया गया था। उसमें नक्सलियों की सभी शरणस्थली का खुलासा हुआ था। भाकपा माओवादी की सेंट्रल कमेटी द्वारा निर्गत गोपनीय दस्तावेज पुलिस के हाथ लगे थे। उनकी भावी रणनीति से जुड़ी बातों की भी जानकारी सरकार को मिल गई थी। सारंडा जंगल झारखंड, ओड़िशा और छत्तीसगढ़ तक फैला है। ऑपरेशन एनाकोंडा के दौरान ओड़िशा और झारखंड पुलिस ने जाल बिछा कर नक्सलियों को मारा था। 33 नक्सली गिरफ्तार हुए थे। बहुत बड़ी संख्या में उनके अत्याधुनिक हथियार पुलिस के हाथ लगे थे। इस ऑपरेशन के बाद भाकपा माओवादी के पांव उखड़े, तो सारंडा जंगल में बसे गांव के लोगों ने उनसे नाता तोड़ लिया था। संगठन को बड़े पैमाने पर आर्थिक क्षति भी हुई। इसके बाद भारत सरकार की निगाह में सारंडा आया। भाकपा माओवादी से सारंडा जंगल के मुक्त होने का संदेश देने के लिए 26 जनवरी 2013 को जयराम रमेश ने वहां तिरंगा फहराया था। अब भाकपा माओवादी सारंडा में अपना झंडा फहराना चाहते हैं।
सहदेवकी फरारी से मिली ताकत
सारंडामें बिटकिलसोय में पहली बार नक्सलियों ने बड़े पैमाने पर पुलिस का नरसंहार किया था। दो दर्जन से अधिक पुलिस वालों को बेरहमी से हत्या की थी। इसके बाद बालिबा कांड हुआ था। इसमें 30 जवानों को मौत के घाट उतारा दिया था। बालिबा कांड का मास्टर माइंड सहदेव महतो था। उसे सारंडा जंगल से ही आईपीएस अफसर साकेत सिंह ने पकड़ा था। सहदेव महतो के फरार होने से भाकपा माओवादी को ताकत मिली है। उसके खिलाफ तत्कालीन डीआईजी नवीन कुमार सिंह ने पोटा कोर्ट में गवाही भी दी थी।