संसार भर में इन दिन
आज लोग इतिहास तो बना सकते हैं, पर इतिहास पुरुष नहीं बन सकते। आज वह समर्पण कहां, जो सौहार्द्र की बदौलत एक नायक का करता था आविर्भाव। आज के अधिकाधिक मतदाता ऐसे हैं, जो सहिष्णुता को नहीं, सांप्रदायिकता और वैमनस्यता को देते हैं अपना मत। जिन्हें ‘मत\\\' का मतलब नहीं आता, वो ‘सत्य\\\' के लिए ‘स्वाधीनता\\\' जीतने की बजाय सत्ता\\\' के लिए ‘स्व\\\' हार जाते हैं।
संसार भर में इन दिनों गरीबी पर बहस जारी है। भूख गरीबी मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या बन गई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की कुल आबादी का 40% लोग गरीबी में जीवन जी रहे हैं। हमारे देश में स्थिति और भी कटु है। आज एक साधारण नहाने की साबुन की कीमत जितनी है, उतनी भर की कमाई करने वाला गरीबी रेखा से नीचे नहीं माना जाना गरीबों के साथ सरकार का क्रूर मजाक नहीं तो और क्या है?
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मन रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा!
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जैसा अरमान वैसा परिणाम
सत्ता के लिए हार
अमीरी-गरीबी की खाई कम हो