को-ऑपरेटिव : यह कॉलेज है या कबाड़खाना?
को-ऑपरेटिव : यह कॉलेज है या कबाड़खाना?
हर साल सपने संजोकर छात्र यहां दाखिला लेते हैं। इन टूटे बेंच-डेस्क पर बैठकर उनका सपना टूट जाता है। ऐसे में जिम्मेदार कौन? प्रिंसिपल डॉ आरके दास कहते हैं, \\\"नया विज्ञान भवन बन रहा है। जल्द सब ठीक हो जाएगा।\\\' कबतक? जवाब नहीं है।
छात्र-छात्राएं लैब की इन बोतलों में रखे केमिकल का उपयोग करती थीं। अब वर्षों से प्रायोगिक कक्षाएं नहीं हुई हैं। विद्यार्थी विज्ञान की बारीकियों से अनजान हैं। कॉलेज में काबिल शिक्षकों की कमी नहीं है। लेकिन, वे भी व्यवस्था से बेबस हैं।
यह जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज है। 1952 में स्थापित यह कॉलेज कभी कोल्हान की शान था। आज तस्वीर इसकी हालत बयां कर रही है। यहां कुल 7500 विद्यार्थियों में विज्ञान के करीब 1200 छात्र हैं। लेकिन, प्रयोगशाला काे देिखए। टूटी कुर्सियां, जंग खाए उपकरण दुर्दशा की कहानी बता रहे हैं। यहां शोध होना चािहए था, लेकिन कबाड़खाना बन गया है।