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पखवाड़े और सप्ताह में सिमट कर रह गई हिंदी
हिंदी दिवस (14 सितंबर) पर विशेष
राष्ट्रभाषा हिंदी किस कदर पखवाड़े और सप्ताह में सिमट कर रह गई है, इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि हर साल सितंबर आते ही केन्द्रीय कार्यालयों में हिंदी सप्ताह और पखवाड़ा का आयोजन शुरू हो जाता है। शहर में हर साल हिंदी के नाम पर 40 लाख रुपए उड़ा दिए जाते हैं, लेकिन नतीजा सिफर होता है।
नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति के सचिव पुरुषोत्तम कुमार कहते हैं, हिंदी दिवस के नाम पर आलेखन एवं टिप्पण, अनुवाद, काव्य पाठ, आशुलिपिक आदि प्रतियोगिताएं होती हैं, जो पूरी तरह अप्रासंगिक हो गई हैं। इससे हिंदी का भला नहीं होने वाला। बकौल कुमार, जब संविधान बना था, उस वक्त केवल 15 साल के लिए अंग्रेजी कामकाज की अनिवार्य भाषा बनाई गई थी, लेकिन 1963 में अधिनियम में संशोधन कर अंग्रेजी को कामकाज की भाषा रहने दी गई। इसकी वजह से यह केवल हिंदी दिवस तक सिमट कर रह गई।
ये है अंग्रेजी
avital set of process variables has been selected as model inputs for predicting tensile austenite, yield strength, elongation and retained austentite for given finish rolling and coiling temperature.
इसकाहिंदी अनुवाद
प्रक्रियाका एक महत्वपूर्ण सेट, तन्यता ताकत की भविष्यवाणी, आदानों की चयनित शक्ति, बढाव उपज और दिए गए रोलिंग और क्वाइलिंग तापमान और आस्टेनाइट बनाए रखने के लिए मॉडल तैयार किया गया है। (एनएमएलकी वार्षिक रिपोर्ट से ली गई)
नहीं बन पाई शोध विज्ञान की भाषा
हिंदीआज भी शोध और विज्ञान की भाषा नहीं बन पाई है। वैज्ञानिक संस्थानों में होने वाले कामकाज से लेकर सारी गतिविधियां अंग्रेजी में होती हैं। यह बात दीगर है कि ये संस्थान हिंदी में अपनी वार्षिक रिपोर्ट तो जारी कर देते हैं, लेकिन इसे पढ़े-लिखे लोगों के लिए समझ पाना भी मुश्किल होता है।